ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ ଫରାସୀ ଘଣ୍ଟି

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❀❣️ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ ଫରାସୀ ଘଣ୍ଟି❣️❀

କଥାରେ କୁହା ଯାଇଛି ବିଶ୍ୱାସେ ମିଳନ୍ତି ହରି ତର୍କେ ବହୁ ଦୂର l ବିଶ୍ୱାସ ହିଁ ମୂଳ l ହିନ୍ଦୁ, ଖ୍ରିଷ୍ଟିୟାନ, ମୁସଲମାନ ଯେ କେହି ହେଉ l

ଏହିସତ୍ୟ ପ୍ରଚାର କରି, ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପରିସର ମଧ୍ୟରେ ରହିଛି ଏକ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ଘଣ୍ଟି l

ଗୋଟିଏ ଜଳ ଜାହାଜ, ଫ୍ରାନ୍ସର ଗୋଟିଏ ବନ୍ଦରରୁ, ଯାତ୍ରା କରୁଥାଏ, ଫ୍ରାନ୍ସ ଉପନିବେଶ ପଣ୍ଡିଚେରୀ ଅଭିମୁଖେ l

ଜାହାଜରେ ଯାଉଥାଏ, ପଣ୍ଡିଚେରୀର ଏକ ଚର୍ଚ୍ଚ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ, ବିରାଟ ଧାତବ ଘଣ୍ଟି l

ଜାହାଜରେ କ୍ୟାପଟେନ ଥାଆନ୍ତି ଅଭିଜ୍ଞ ଅଧିନାୟକ କ୍ୟାପଟେନ ବିଟୋ l

ତାଙ୍କ ଜୀବନକାଳରେ ସେ ବହୁବାର ବିଭିନ୍ନ ବିପଦର ସଫଳ ମୁକାବିଲା କରି ଆସିଛନ୍ତି l

ଜାହାଜ ନିର୍ବିଘ୍ନରେ ସମୁଦ୍ରରେ ଗତି କରୁଥାଏ l

ହଠାତ ଜଣେ କର୍ମଚାରୀ ଦୂରବିନରେ ଦେଖିଲେ, ଅଦୂରରେ, ଗୋଟିଏ ବିରାଟକାୟ ଜଳଜୀବ, ତାଙ୍କ ଜାହାଜ ଆଡ଼କୁ ମାଡ଼ି ଆସୁଛି l

ବିପଦ ଆଶଙ୍କା କରି, ସେ କ୍ୟାପଟେନ ବିଟୋଙ୍କୁ ଯାଇ ତୁରନ୍ତ ଖବର ଦେଲେ l

ବିଟୋ ଆସି ସେ ଦୃଶ୍ୟଟି ଦେଖିଲେ, କିନ୍ତୁ ଅଭିଜ୍ଞ କ୍ୟାପଟେନ ବୁଝି ଗଲେ, ଏହା କୌଣସି ଜୀବ ନୁହେଁ,ଏହା ଗୋଟିଏ ଭୟଙ୍କର ସାମୁଦ୍ରିକ ଝଡ଼ l ଭୀଷଣ ବିପଦ ମାଡ଼ି ଆସୁଛି l ତାଙ୍କୁ କିଛି ବୁଦ୍ଧିବାଟ ଦିଶୁ ନଥାଏ l

ସେ ଜାହାଜଟିକୁ ରକ୍ଷା କରିବା ଚିନ୍ତାରେ ଇତସ୍ତତଃ ବୁଲି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସତର୍କ କରାଇବା ସହ ବିପଦ ଘଣ୍ଟିଟି ବଜାଇ ଦେଲେ l

ସମସ୍ତେ ବଡ଼ ଆତଙ୍କିତ ହୋଇ କ’ଣ ହେବ ବୋଲି ଭାବି ହେଉ ଥାଆନ୍ତି l
କୋଳାହଳ ଭିତରେ କ୍ୟାପଟେନ ବିଟୋ ଦେଖିଲେ, ଜଣେ କର୍ମଚାରୀ, ସ୍ଥିର ହୋଇ ବସି, ଗୋଟିଏ ଫଟୋକୁ ନିରିଖେଇକି ଦେଖୁଛି l

ଜଣାପଡୁଥାଏ, ସେ ଯେମିତି ଏ ଆସନ୍ନ ବିପଦରେ ଆଦୌ ଆତଙ୍କିତ ନୁହେଁ l

କ୍ୟାପଟେନ ଦେଖିଲେ, ଲୋକଟି, ଦୁଇଟି ଗୋଲାକାର ଚକ୍ଷୁର ଚିତ୍ର ଉପରେ ମନୋନିବେଶ କରିଛି l

କ୍ୟାପଟେନ ତା କାନ୍ଧରେ ହାତ ପକାଇ କହିଲେ, ଆସନ୍ନ ବିପଦ ପାଈଁ ସମସ୍ତେ ଆତଙ୍କିତ। ଅଥଚ ତୁମେ ନିଶ୍ଚଳ ହୋଇ ବସିଛ। ଏ କ’ଣ କରୁଛ?

ଲୋକଟି କହିଲା, ମୁଁ ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଭଜନ କରୁଛି l ଆସନ୍ନ ବିପଦରୁ ମହାପ୍ରଭୁ ରକ୍ଷା କରିବେ ଏ ଦୃଢ଼ ବିଶ୍ୱାସ ମୋର ଅଛି l ପୁଣି କହିଲା ଜୀବନରେ ମୁଁ ବହୁବାର ପରୀକ୍ଷା କରି ଦେଖିଛି ତାଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଲେ ବିପଦ ଛାଏଁ ଛାଏଁ ଟଳି ଯାଏ l

କ୍ୟାପଟେନ, କର୍ମଚାରୀଟିର ଦୃଢ଼ ବିଶ୍ୱାସ ଦେଖି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହେଲେ l ମନେ ମନେ ଭାବିଲେ, ହଁ ମୁଁ ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ନାମ ଶୁଣିଛି। ହେଲେ ଥରେ ତାଙ୍କୁ ଦେଖିବାର ସୁଯୋଗ ଲାଭ କରି ନାହିଁ l ବିପଦ ବେଳେ ତାଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କଲେ ସେ ହୁଏତ ସହାୟ ହୋଇ ପାରନ୍ତି l

ଖ୍ରୀଷ୍ଟ ଧର୍ମରେ ବିଶ୍ୱାସୀ ବିଟୋଙ୍କ ବିଶ୍ୱାସ ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଉପରେ ଦୃଢ଼ ହେଉନଥାଏ l

କର୍ମଚାରୀଟିର ଅନୁରୋଧରେ କ୍ୟାପଟେନ ସେହି ଚକାନେତ୍ର ଦୁଇଟିକୁ ଚାହିଁ ବସିଲେ l ତାଙ୍କ ଦେଖା ଦେଖି ସବୁ କର୍ମଚାରୀ ମଧ୍ୟ ସେହି ଫଟୋ ଚିତ୍ରକୁ ଚାହିଁ ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଧ୍ୟାନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ l
ସକଳେ ହୋଇ ଏକ ମୁଖ l
ଡାକିଲେ ନାରାୟଣ ରଖ ll

କ୍ୟାପଟେନ ଚକାନେତ୍ର ଦ୍ୱୟରେ ଚକ୍ଷୁ ମୁଦ୍ରିତକରି ଧ୍ୟାନ ଆବଦ୍ଧ କରି ବସିଥାନ୍ତି l ଏମିତି କିଛି ସମୟ କଟିଗଲା l

କ୍ୟାପଟେନ ଚକ୍ଷୁ ଖୋଲି ଦେଖନ୍ତି ତ ଜାହାଜ ଧୀରେ ଧୀରେ ଆଗକୁ ଗତି କରୁଛି l ଭୟଙ୍କର ଝଡ଼ କୁଆଡ଼େ ଉଭେଇ ଯାଇଛି l ଆଉ କିଛି ବିପଦ ନାହିଁ l

ଆନନ୍ଦ ଅଧୀର କ୍ୟାପଟେନ ଯାଇ କୁଣ୍ଢାଇ ପକାଇଲେ ଜଗନ୍ନାଥ ଭକ୍ତ ସେହି କର୍ମଚାରୀକୁ l ଗଦ ଗଦ କଣ୍ଠରେ ତାଙ୍କୁ ଜାବୁଡି ଧରି କହିଲେ, ତୁମରି ଯୋଗୁଁ ଆମେ ଏ ଭୟଙ୍କର ବିପଦରୁ ରକ୍ଷା ପାଇଲୁ l ତୁମ ପ୍ରାର୍ଥନାରେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ମହାପ୍ରଭୁ ଝଡ଼ର ଗତି ବଦଳାଇଦେଲେ l ତେବେ କୁହ ସେ ଜଗନ୍ନାଥ କାହାଁନ୍ତି l କଅଣ ତାଙ୍କୁ ଥରେ ମୁଁ ଦର୍ଶନ କରି ପାରିବିନି l

ଏ ପ୍ରଶ୍ନଶୁଣି ସେ ଭକ୍ତ କର୍ମଚାରୀଟି କହିଲା, ମହାପ୍ରଭୁ ଜଗନ୍ନାଥ, ଭାରତ ପୂର୍ବ ଉପକୂଳରେ, ଶ୍ରୀକ୍ଷେତ୍ର ପୁରୀରେ ନୀଳାଚଳ ଧାମ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ, ବିରାଜମାନ କରୁଛନ୍ତି l ସେ ବଡ଼ କରୁଣାମୟ l ତୁମ୍ଭେ ଚାହିଁଲେ ନିଶ୍ଚୟ ତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ଲାଭ କରି ପାରିବ l

ଏକଥା ଶୁଣି କ୍ୟାପଟେନ କର୍ମଚାରୀଙ୍କୁ ନିର୍ଦ୍ଧେଶ ଦେଲେ ତୁମେ ବର୍ତ୍ତମାନ ଶ୍ରୀକ୍ଷେତ୍ର ଅଭିମୁଖେ ଜାହାଜ ଚଳାଅ l

ଏ ଘଣ୍ଟାକୁ ଆଉ ପଣ୍ଡିଚେରୀରେ ଦେବାର କୌଣସି ଆବଶ୍ୟକତା ନାହିଁ l ଘଣ୍ଟାକୁ ମୁଁ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଅନୁଭୂତିରେ ଆଣିଥିବା ମହାପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କୁ ଉପହାର ଦେବି l

ଜାହାଜ ଚାଲିଲା ପୁରୀ ଅଭିମୁଖେ l କ୍ୟାପଟେନ ବିଟୋ ଶ୍ରୀ ମନ୍ଦିରରେ ପହଞ୍ଚି ପତିତପାବନଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କଲେ l କିଛି ଉପହାର ସହିତ ଘଣ୍ଟାଟିକୁ ସମର୍ପଣ କଲେ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କୁl

ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ମହିମା ପ୍ରଚାର କରୁଥିବା ସେହି ଘଣ୍ଟାଟି ଏବେ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପଶ୍ଚିମ ଦ୍ଵାର ନିକଟରେ ଥିବା ନିଳାଦ୍ରି ବିହାର ମ୍ୟୁଜିୟମ ପରିସରରେ ରଖାଯାଇଛି l

ଘଣ୍ଟାରେ ଫ୍ରେଞ୍ଚ ଅକ୍ଷରରେ ଲେଖା ଯାଇଛି,” CANTA BOET PSALLAMIN GEN TIBUS DE FRANCE MF PONDICHERRY 1746,NOMME PIWRRIE ANDRE JF PESSE 900, A PONDICHERRY 1746 IA LIBERALITE DE PEDRO MOUDEN COURT ” l

ଏହା ସେହି ୧୭୪୬ ମସିହାର ଘଟଣା l ଘଣ୍ଟା ପାଦଦେଶରେ ସିମେଣ୍ଟ ଫଳକରେ ଘଟଣାଟିର ସଂକ୍ଷିପ୍ତ ବିବରଣୀ ଲେଖା ହୋଇ ରହିଛି l

ସ୍ୱାଧୀନତା ପରେ, ଫ୍ରାନ୍ସ ସରକାର ଏହି ଘଣ୍ଟାକୁ ଫେରାଇ ଦେବା ପାଈଁ ଭାରତ ସରକାରଙ୍କ ଠାରେ ଦାବି ରଖିଥିଲେ l

ମାତ୍ର ଜଗନ୍ନାଥଙ୍କୁ ଏହା ଭକ୍ତର ଭକ୍ତି ନିବେଦନ ବୋଲି କହି ଏହା ଆଉ ଫେରାଇ ଦିଆ ଯାଇ ନଥିଲା l

ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଦର୍ଶନରେ ଯାଉଥିବା ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭକ୍ତଙ୍କୁ ନିବେଦନ ଏହି ଅପୂର୍ଵ ଘଣ୍ଟାକୁ ଥରେ ନିଶ୍ଚୟ ଦର୍ଶନ କରିବା ପାଈଁ l

ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ଚକା ଆଖିକୁ ନେତ୍ରପଥରେ ରଖିଲେ ବିପଦ ଅବଲୀଳା କ୍ରମେ କଟିଯାଏ ଏହି ଘଣ୍ଟାଟି ତା’ର ନିଦର୍ଶନ l

ସେଥିପାଇଁ ନାରୀ କବି କଳ୍ପଲତା ଜେନା କହିଛନ୍ତି :-

ଜଗବନ୍ଧୁ ନାଥଙ୍କୁ ଯେ ମୁରୁଛି ନୁହଁଇ l
ଯେଣିକି ଚାହିଁଲେ ତାଙ୍କ ଶ୍ରୀମୁଖ ଦିଶଇ ll
ଧନ୍ୟ ତାଙ୍କ ଚକା ଆଖି,ମନ ରହିଯାଏ ଲାଖି,
ବାହୁ ଟେକିଛନ୍ତି ଦୁଃଖୀ ତାରିବା ପାଈଁ ll

ସଂଗୃହିତ

✿❁❣️ ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ଶରଣଂ ❣️❁✿

कालसर्पयोग के प्रकार एवं निराकरण उपाय

कालसर्प योग के प्रमुख भेद कालसर्प योग मुख्यत: बारह प्रकार के माने गये हैं। आगे सभी भेदों को उदाहरण कुंडली प्रस्तुत करते हुए समझाने का प्रयास किया गया है – [ कुल २८८ प्रकार के काल सर्प योग धी उपलव्ध हैै ।

🟣 1 -अनन्त कालसर्प योग

जब जन्मकुंडली में राहु लग्न में व केतु सप्तम में हो और उस बीच सारे ग्रह हों तो अनन्त नामक कालसर्प योग बनता है। ऐसे जातकों के व्यक्तित्व निर्माण में कठिन परिश्रम की जरूरत पड़ती है। उसके विद्यार्जन व व्यवसाय के काम बहुत सामान्य ढंग से चलते हैं और इन क्षेत्रों में थोड़ा भी आगे बढ़ने के लिए जातक को कठिन संघर्ष करना पड़ता है। मानसिक पीड़ा कभी-कभी उसे घर- गृहस्थी छोड़कर वैरागी जीवन अपनाने के लिए भी उकसाया करती हैं। लाटरी, शेयर व सूद के व्यवसाय में ऐसे जातकों की विशेष रुचि रहती हैं किंतु उसमें भी इन्हें ज्यादा हानि ही होती है। शारीरिक रूप से उसे अनेक व्याधियों का सामना करना पड़ता है। उसकी आर्थिक स्थिति बहुत ही डांवाडोल रहती है। फलस्वरूप उसकी मानसिक व्यग्रता उसके वैवाहिक जीवन में भी जहर घोलने लगती है। जातक को माता-पिता के स्नेह व संपत्ति से भी वंचित रहना पड़ता है। उसके निकट संबंधी भी नुकसान पहुंचाने से बाज नहीं आते। कई प्रकार के षड़यंत्रों व मुकदमों में फंसे ऐसे जातक की सामाजिक प्रतिष्ठा भी घटती रहती है। उसे बार-बार अपमानित होना पड़ता है। लेकिन प्रतिकूलताओं के बावजूद जातक के जीवन में एक ऐसा समय अवश्य आता है जब चमत्कारिक ढंग से उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। वह चमत्कार किसी कोशिश से नहीं, अचानक घटित होता है। सम्पूर्ण समस्याओं के बाद भी जरुरत पड़ने पर किसी चीज की इन्हें कमी नहीं रहती है। यह किसी का बुरा नहीं करते हैं। जो जातक इस योग से ज्यादा परेशानी महसूस करते हैं। उन्हें निम्नलिखित उपाय कर लाभ उठाना चाहिए।

🌹अनुकूल उपाय –

विद्यार्थीजन सरस्वती जी के बीज मंत्रों का एक वर्ष तक जाप करें और विधिवत उपासना करें।
देवदारु, सरसों तथा लोहवान को उबालकर उस पानी से सवा महीने तक स्नान करें।
शुभ मुहूर्त में बहते पानी में कोयला तीन बार प्रवाहित करें।
हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें।
महामृत्युन्जय मन्त्र का जाप करने से भी अनन्त काल सर्प दोष का शान्ति होता है।
गृह में मयूर (मोर) पंख रखें।

🟣 2- कुलिक कालसर्प योग

राहु दूसरे घर में हो और केतु अष्टम स्थान में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के बीच में हो तो कुलिक नाम कालसर्प योग होगा। जातक को अपयश का भी भागी बनना पड़ता है। इस योग की वजह से जातक की पढ़ाई-लिखाई सामान्य गति से चलती है और उसका वैवाहिक जीवन भी सामान्य रहता है। परंतु आर्थिक परेशानियों की वजह से उसके वैवाहिक जीवन में भी जहर घुल जाता है। मित्रों द्वारा धोखा, संतान सुख में बाधा और व्यवसाय में संघर्ष कभी उसका पीछा नहीं छोड़ते। जातक का स्वभाव भी विकृत हो जाता है। मानसिक असंतुलन और शारीरिक व्याधियां झेलते-झेलते वह समय से पहले ही बूढ़ा हो जाता है। उसके उत्साह व पराक्रम में निरंतर गिरावट आती जाती है। उसका कठिन परिश्रमी स्वभाव उसे सफलता के शिखर पर भी पहुंचा देता है। परंतु इस फल को वह पूर्णतय: सुखपूर्वक भोग नहीं पाता है। ऐसे जातकों को इस योग की वजह से होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपायों का अवलंबन लेना चाहिए।

🌹अनुकूल उपाय –

विद्यार्थीजन सरस्वती जी के बीज मंत्रों का एक वर्ष तक जाप करें और विधिवत उपासना करें।
देवदारु, सरसों तथा लोहवान को उबालकर उस पानी से सवा महीने तक स्नान करें।
शुभ मुहूर्त में बहते पानी में कोयला तीन बार प्रवाहित करें।
हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें।
श्रावण मास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।
शनिवार औ मंगलवार का व्रत रखें और शनि मंदिर में जाकर भगवान शनिदेव कर पूजन करें व तैलाभिषेक करें, इससे तुरंत कार्य सफलता प्राप्त होती है।
राहु की दशा आने पर प्रतिदिन एक माला राहु मंत्रा का जाप करें और जब जाप की संख्या 18 हजार हो जाये तो राहु की मुख्य समिधा दुर्वा से पूर्णाहुति हवन कराएं और किसी गरीब को उड़द व नीले वस्त्रा का दान करें ।

🟣 3 वासुकी कालसर्प योग

राहु तीसरे घर में और केतु नवम स्थान में और इस बीच सारे ग्रह ग्रसित हों तो वासुकी नामक कालसर्प योग बनता है। वह भाई-बहनों से भी परेशान रहता है। अन्य पारिवारिक सदस्यों से भी आपसी खींचतान बनी रहती है। रिश्तेदार एवं मित्रगण उसे प्राय: धोखा देते रहते हैं। घर में सुख-शांति का अभाव रहता है। जातक को समय-समय पर व्याधि ग्रसित करती रहती हैं जिसमें अधिक धान खर्च हो जाने के कारण उसकी आर्थिक स्थिति भी असामान्य हो जाती है। अर्थोपार्जन के लिए जातक को विशेष संघर्ष करना पड़ता है, फिर भी उसमें सफलता संदिग्धा रहती है। चंद्रमा के पीड़ित होने के कारण उसका जीवन मानसिक रूप से उद्विग्न रहता है। इस योग के कारण जातक को कानूनी मामलों में विशेष रूप से नुकसान उठाना पड़ता है। राज्यपक्ष से प्रतिकूलता रहती है। जातक को नौकरी या व्यवसाय आदि के क्षेत्रा में निलम्बन या नुकसान उठाना पड़ता है। यदि जातक अपने जन्म स्थान से दूर जाकर कार्य करें तो अधिक सफलता मिलती है। लेकिन सब कुछ होने के बाद भी जातक अपने जीवन में बहुत सफलता प्राप्त करता है। विलम्ब से उत्ताम भाग्य का निर्माण भी होता है और शुभ कार्य सम्पादन हेतु उसे कई अवसर प्राप्त होते हैं।

🌹अनुकूल उपाय –

नव नाग स्तोत्रा का एक वर्ष तक प्रतिदिन पाठ करें। प्रत्येक बुधवार को काले वस्त्रों में उड़द या मूंग एक मुट्ठी डालकर, राहु का मंत्रा जप कर भिक्षाटन करने वाले को दे दें। यदि दान लेने वाला कोई नहीं मिले तो बहते पानी में उस अन्न हो प्रवाहित करें। 72 बुधवार तक करने से अवश्य लाभ मिलता है।
महामृत्युंजय मंत्रों का जाप प्रतिदिन 11 माला रोज करें, जब तक राहु केतु की दशा-अंर्तदशा रहे और हर शनिवार को श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करें और मंगलवार को हनुमान जी को चौला चढ़ायें।
किसी शुभ मुहूर्त में नाग पाश यंत्रा को अभिमंत्रित कर धारण करें।

🟣 4- शंखपाल कालसर्प योग

राहु चौथे स्थान में और केतु दशम स्थान में
हो इसके बीच सारे ग्रह हो तो शंखपाल नामक कालसर्प योग बनता है। इससे घर-द्वार, जमीन-जायदाद व चल- अचल संपत्तिा संबंधी थोड़ी बहुत कठिनाइयां आती हैं और उससे जातक को कभी-कभी बेवजह चिंता घेर लेती है तथा विद्या प्राप्ति में भी उसे आंशिक रूप से तकलीफ उठानी पड़ती है। जातक को माता से कोई, न कोई किसी न किसी समय आंशिक रूप में तकलीफ मिलती है। सवारी एवं नौकरों की वजह से भी कोई न कोई कष्ट होता ही रहता है। इसमें उन्हें कुछ नुकसान भी उठाना पड़ता है। जातक का वैवाहिक जीवन सामान्य होते हुए भी वह कभी-कभी तनावग्रस्त हो जाता है। चंद्रमा के पीड़ित होने के कारण जातक समय-समय पर मानसिक संतुलन खोया रहता है। कार्य के क्षेत्रा में भी अनेक विघ्न आते हैं। पर वे सब विघ्न कालान्तर में स्वत: नष्ट हो जाते हैं। बहुत सारे कामों को एक साथ करने के कारण जातक का कोई भी काम प्राय: पूरा नहीं हो पाता है। इस योग के प्रभाव से जातक का आर्थिक संतुलन बिगड़ जाता है, जिस कारण आर्थिक संकट भी उपस्थित हो जाता है। लेकिन इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी जातक को व्यवसाय, नौकरी तथा राजनीति के क्षेत्रा में बहुत सफलताएं प्राप्त होती हैं एवं उसे सामाजिक पद प्रतिष्ठा भी मिलती है। यदि उपरोक्त परेशानी महसूस करते हैं तो निम्नलिखित उपाय करें। अवश्य लाभ मिलेगा।

🌹अनुकूल उपाय –

शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से निर्मित नाग चिपका दें।
शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को जल में तीन बार प्रवाहित करें।
86 शनिवार का व्रत करें और राहु, केतु व शनि के साथ हनुमान की आराधना करें। और हनुमान जी को मंगलवार को चौला चढ़ायें और शनिवार को श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करें
किसी शुभ मुहूर्त में एकाक्षी नारियल अपने ऊपर से सात बार उतारकर सात बुधवार को गंगा या यमुना जी में प्रवाहित करें।
सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।
शुभ मुहूर्त में सर्वतोभद्रमण्डल यंत्रा को पूजित कर धारण करें।
नित्य प्रति हनुमान चालीसा पढ़ें और भोजनालय में बैठकर भोजन करें। हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और पांच मंगलवार का व्रत करते हुए हनुमान जी को चमेली के तेल में घुला सिंदूर व बूंदी के लड्डू चढ़ाएं।
काल सर्प दोष निवारण यंत्रा घर में स्थापित कर उसका प्रतिदिन पूजन करें और शनिवार को कटोरी में सरसों का तेल लेकर उसमें अपना मुंह देख एक सिक्का अपने सिर पर तीन बार घुमाते हुए तेल में डाल दें और उस कटोरी को किसी गरीब आदमी को दान दे दें अथवा पीपल की जड़ में चढ़ा दें।
सवा महीने तक जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं और प्रत्येक शनिवार को चींटियों को शक्कर मिश्रित सत्ताू उनके बिलों पर डालें।
किसी शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को बहते जल में तीन बार प्रवाहित करें तथा किसी शुभ मुहूर्त में शनिवार के दिन बहते पानी में तीन बार कोयला भी प्रवाहित करें।

🟣 5 – पद्म कालसर्प योग

राहु पंचम व केतु एकादश भाव में तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म कालसर्प योग बनता है। इसके कारण जातक के विद्याध्ययन में कुछ व्यवधान उपस्थित होता है। परंतु कालान्तर में वह व्यवधान समाप्त हो जाता है। उन्हें संतान प्राय: विलंब से प्राप्त होती है, या संतान होने में आंशिक रूप से व्यवधान उपस्थित होता है। जातक को पुत्र संतान की प्राय: चिंता बनी रहती है। जातक का स्वास्थ्य कभी-कभी असामान्य हो जाता है। इस योग के कारण दाम्पत्य जीवन सामान्य होते हुए भी कभी-कभी अधिक तनावपूर्ण हो जाता है। परिवार में जातक को अपयश मिलने का भी भय बना रहता है। जातक के मित्रगण स्वार्थी होते हैं और वे सब उसका पतन कराने में सहायक होते हैं। जातक को तनावग्रस्त जीवन व्यतीत करना पड़ता है। इस योग के प्रभाव से जातक के गुप्त शत्रू भी होते हैं। वे सब उसे नुकसान पहुंचाते हैं। उसके लाभ मार्ग में भी आंशिक बाधा उत्पन्न होती रहती है एवं चिंता के कारण जातक का जीवन संघर्षमय बना रहता है। जातक द्वारा अर्जित सम्पत्तिा को प्राय: दूसरे लोग हड़प लेते हैं। जातक को व्याधियां भी घेर लेती हैं। इलाज में अधिाक धन खर्च हो जाने के कारण आर्थिक संकट उपस्थित हो जाता है। जातक वृध्दावस्था को लेकर अधिक चिंतित रहता है एवं कभी-कभी उसके मन में संन्यास ग्रहण करने की भावना भी जागृत हो जाती है। लेकिन इतना सबकुछ होने के बाद भी एक समय ऐसा आता है कि यह जातक आर्थिक दृष्टि से बहुत मजबूत होता है, समाज में मान-सम्मान मिलता है और कारोबार भी ठीक रहता है यदि यह जातक अपना चाल-चलन ठीक रखें, मध्यपान न करें और अपने मित्र की सम्पत्ति को न हड़पे तो उपरोक्त कालसर्प प्रतिकूल प्रभाव लागू नहीं होते हैं।

🌹अनुकूल उपाय –

शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से मिर्मित नाग चिपका दें।

शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से व्रत प्रारंभ कर 18 शनिवारों तक व्रत करें और काला वस्त्रा धारण कर 18 या 3 माला राहु के बीज मंत्रा का जाप करें। फिर एक बर्तन में जल दुर्वा और कुशा लेकर पीपल की जड़ में चढ़ाएं। भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी, समयानुसार रेवड़ी तिल के बने मीठे पदार्थ सेवन करें और यही वस्तुएं दान भी करें। रात में घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ में रख दें। नाग पंचमी का व्रत भी अवश्य करें।

नित्य प्रति हनुमान चालीसा का 11 बार पाठ करें और हर शनिवार को लाल कपड़े में आठ मुट्ठी भिंगोया चना व ग्यारह केले सामने रखकर हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और उन केलों को बंदरों को खिला दें और प्रत्येक मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं और हनुमान जी की प्रतिमा पर चमेली के तेल में घुला सिंदूर चढ़ाएं और साथ ही श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करें। ऐसा करने से वासुकी काल सर्प योग के समस्त दोषों की शांति हो जाती है।

श्रावण के महीने में प्रतिदिन स्नानोपरांत 11 माला ‘नम: शिवाय’ मंत्रा का जप करने के उपरांत शिवजी को बेलपत्रा व गाय का दूध तथा गंगाजल चढ़ाएं तथा सोमवार का व्रत करें।

🟣 6- महापद्म कालसर्प योग

राहु छठे भाव में और केतु बारहवे भाव में और इसके बीच सारे ग्रह अवस्थित हों तो महापद्म कालसर्प योग बनता है। इस योग में जातक शत्रु विजेता होता है, विदेशों से व्यापार में लाभ कमाता है लेकिन बाहर ज्यादा रहने के कारण उसके घर में शांति का अभाव रहता है। इस योग के जातक को एक ही चिज मिल सकती है धन या सुख। इस योग के कारण जातक यात्रा बहुत करता है उसे यात्राओं में सफलता भी मिलती है परन्तु कई बार अपनो द्वारा धोखा खाने के कारण उनके मन में निराशा की भावना जागृत हो उठती है एवं वह अपने मन में शत्रुता पालकर रखने वाला भी होता है। जातक का चरित्रा भी बहुत संदेहास्पद हो जाता है। उसके धर्म की हानि होती है। वह समय-समय पर बुरा स्वप्नदेखता है। उसकी वृध्दावस्था कष्टप्रद होती है। इतना सब कुछ होने के बाद भी जातक के जीवन में एक अच्छा समय आता है और वह एक अच्छा दलील देने वाला वकील अथवा तथा राजनीति के क्षेत्रा में सफलता पाने वाला नेता होता है।

🌹अनुकूल उपाय –

श्रावणमास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।

शुक्ल पक्ष के प्रथम शनिवार से शनिवार व्रत आरंभ करना चाहिए। यह व्रत 18 बार करें। काला वस्त्रा धारण करके 18या 3 राहु बीज मंत्रा की माला जपें। तदन्तर एक बर्तन में जल, दुर्वा और कुश लेकर पीपल की जड़ में डालें। भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी समयानुसार रेवड़ी, भुग्गा, तिल के बने मीठे पदार्थ सेवन करें और यही दान में भी दें। रात को घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ के पास रख दें।

इलाहाबाद (प्रयाग) में संगम पर नाग-नागिन की विधिवत पूजन कर दूध के साथ संगम में प्रवाहित करें एवं तीर्थराज प्रयाग में संगम स्थान में तर्पण श्राध्द भी एक बार अवश्य करें।

मंगलवार एवं शनिवार को रामचरितमानस के सुंदरकाण्ड का 108 बार पाठ श्रध्दापूर्वक करें।

🟣 7- तक्षक कालसर्प योग

केतु लग्न में और राहु सप्तम स्थान में हो तो तक्षक नामक कालसर्प योग बनता है। कालसर्प योग की शास्त्रीय परिभाषा में इस प्रकार का अनुदित योग परिगणित नहीं है। लेकिन व्यवहार में इस प्रकार के योग का भी संबंधित जातकों पर अशुभ प्रभाव पड़ता देखा जाता है। तक्षक नामक कालसर्प योग से पीड़ित जातकों को पैतृक संपत्तिा का सुख नहीं मिल पाता। या तो उसे पैतृक संपत्तिा मिलती ही नहीं और मिलती है तो वह उसे किसी अन्य को दान दे देता है अथवा बर्बाद कर देता है। ऐसे जातक प्रेम प्रसंग में भी असफल होते देखे जाते हैं। गुप्त प्रसंगों में भी उन्हें धोखा खाना पड़ता है। वैवाहिक जीवन सामान्य रहते हुए भी कभी-कभी संबंध इतना तनावपूर्ण हो जाता है कि अलगाव की नौबत आ जाती है। जातक को अपने घर के अन्य सदस्यों की भी यथेष्ट सहानुभूति नहीं मिल पाती। साझेदारी में उसे नुकसान होता है तथा समय-समय पर उसे शत्रू षड़यंत्रों का शिकार बनना पड़ता है। जुए, सट्टे व लाटरी की प्रवृत्तिा उस पर हावी रहती है जिससे वह बर्बादी के कगार पर पहुंच जाता है। संतानहीनता अथवा संतान से मिलने वाली पीड़ा उसे निरंतर क्लेश देती रहती है। उसे गुप्तरोग की पीड़ा भी झेलनी पड़ती है। किसी को दिया हुआ धान भी उसे समय पर वापस नहीं मिलता। यदि यह जातक अपने जीवन में एक बात करें कि अपना भलाई न सोच कर ओरों का भी हित सोचना शुरु कर दें साथ ही अपने मान-सम्मान के दूसरों को नीचा दिखाना छोड़ दें तो उपरोक्त समस्याएं नहीं आती।

🌹अनुकूल उपाय –

कालसर्प दोष निवारण यंत्र घर में स्थापित करके, इसका नियमित पूजन करें।

सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।

देवदारु, सरसों तथा लोहवान – इन तीनों को उबालकर एक बार स्नान करें।

शुभ मुहूर्त में बहते पानी में मसूर की दाल सात बार प्रवाहित करें और उसके बाद लगातार पांच मंगलवार को व्रत रखते हुए हनुमान जी की प्रतिमा में चमेली में घुला सिंदूर अर्पित करें और बूंदी के लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद वितरित करें। अंतिम मंगलवार को सवा पांव सिंदूर सवा हाथ लाल वस्त्रा और सवा किलो बताशा तथा बूंदी के लड्डू का भोग लगाकर प्रसाद बांटे।

🟣 8- कर्कोटक कालसर्प योग

केतु दूसरे स्थान में और राहु अष्टम स्थान में कर्कोटक नाम कालसर्प योग बनता है। जैसा कि हम इस बात को पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं, ऐसे जातकों के भाग्योदय में इस योग की वजह से कुछ रुकावटें अवश्य आती हैं। नौकरी मिलने व पदोन्नति होने में भी कठिनाइयां आती हैं। कभी-कभी तो उन्हें बड़े ओहदे से छोटे ओहदे पर काम करनेका भी दंड भुगतना पड़ता है। पैतृक संपत्तिा से भी ऐसे जातकों को मनोनुकूल लाभ नहीं मिल पाता। व्यापार में भी समय-समय पर क्षति होती रहती है। कोई भी काम बढ़िया से चल नहीं पाता। कठिन परिश्रम के बावजूद उन्हें पूरा लाभ नहीं मिलता। मित्रों से धोखा मिलता है तथा शारीरिक रोग व मानसिक परेशानियों से व्यथित जातक को अपने कुटुंब व रिश्तेदारों के बीच भी सम्मान नहीं मिलता। चिड़चिड़ा स्वभाव व मुंहफट बोली से उसे कई झगड़ों में फंसना पड़ता है। उसका उधार दिया पैसा भी डूब जाता है। शत्रू षड़यंत्रा व अकाल मृत्यु का जातक को बराबर भय बना रहता है। उक्त परेशानियों से बचने के लिए जातक निम्न उपाय कर सकते हैं।

🌹अनुकूल उपाय –

हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और पांच मंगलवार का व्रत करते हुए हनुमान जी को चमेली के तेल में घुला सिंदूर व बूंदी के लड्डू चढ़ाएं।

काल सर्प दोष निवारण यंत्रा घर में स्थापित कर उसका प्रतिदिन पूजन करें और शनिवार को कटोरी में सरसों का तेल लेकर उसमें अपना मुंह देख एक सिक्का अपने सिर पर तीन बार घुमाते हुए तेल में डाल दें और उस कटोरी को किसी गरीब आदमी को दान दे दें अथवा पीपल की जड़ में चढ़ा दें।

सवा महीने तक जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं और प्रत्येक शनिवार को चींटियों को शक्कर मिश्रित सत्ताू उनके बिलों पर डालें।

अपने सोने वाले कमरे में लाल रंग के पर्दे, चादर व तकियों का प्रयोग करें।

किसी शुभ मुहूर्त में सूखे नारियल के फल को बहते जल में तीन बार प्रवाहित करें तथा किसी शुभ मुहूर्त में शनिवार के दिन बहते पानी में तीन बार कोयला भी प्रवाहित करें।

🟣 9- शंखचूड़ कालसर्प योग

केतु तीसरे स्थान में व राहु नवम स्थान में शंखचूड़ नामक कालसप्र योग बनता है। इस योग से पीड़ित जातकों का भाग्योदय होने में अनेक प्रकार की अड़चने आती रहती हैं। व्यावसायिक प्रगति, नौकरी में प्रोन्नति तथा पढ़ाई-लिखाई में वांछित सफलता मिलने में जातकों को कई प्रकार के विघ्नों का सामना करना पड़ता है। इसके पीछे कारण वह स्वयं होता है क्योंकि वह अपनो का भी हिस्सा छिनना चाहता है। अपने जीवन में धर्म से खिलवाड़ करता है। इसके साथ ही उसका अपना अत्याधिक आत्मविश्वास के कारण यह सारी समस्या उसे झेलनी पड़ती है। अधिक सोच के कारण शारीरिक व्याधियां भी उसका पीछा नहीं छोड़ती। इन सब कारणों के कारण सरकारी महकमों व मुकदमेंबाजी में भी उसका धन खर्च होता रहता है। उसे पिता का सुख तो बहुत कम मिलता ही है, वह ननिहाल व बहनोइयों से भी छला जाता है। उसके मित्र भी धोखाबाजी करने से बाज नहीं आते। उसका वैवाहिक जीवन आपसी वैमनस्यता की भेंट चढ़ जाता है। उसे हर बात के लिए कठिन संघर्ष करना पड़ता है। उसे समाज में यथेष्ट मान-सम्मान भी नहीं मिलता। उक्त परेशानियों से बचने के लिए उसे अपना को अपनाना पड़ेगा, अपनो से प्यार करना होगा, धर्म की राह पर चलना होगा एवं मुंह में राम बगल में छूरी की भावना को त्यागना होगा तो जीवन में बहुत कम कठीनाइयों का सामना करना पड़ेगा। तब भी कठिनाईयां आति हैं तो निम्नलिखित उपाय बड़े लाभप्रद सिध्द होते हैं।

🌹अनुकूल उपाय –

इस काल सर्प योग की परेशानियों से बचने के लिए संबंधिात जातक को किसी महीने के पहले शनिवार से शनिवार का व्रत इस योग की शांति का संकल्प लेकर प्रारंभ करना चाहिए और उसे लगातार 86 शनिवारों का व्रत रखना चाहिए। व्रत के दौरान जातक काला वस्त्रा धारण करें श्री शनिदेव का तैलाभिषेक करें, राहु बीज मंत्रा की तीन माला जाप करें। जाप के उपरांत एक बर्तन में जल, दुर्वा और कुश लेकर पीपल की जड़ में डालें। भोजन में मीठा चूरमा, मीठी रोटी, रेवड़ी, तिलकूट आदि मीठे पदार्थों का उपयोग करें। उपयोग के पहले इन्हीं वस्तुओं का दान भी करें तथा रात में घी का दीपक जलाकर पीपल की जड़ में रख दें।

महामृत्युंजय कवच का नित्य पाठ करें और श्रावण महीने के हर सोमवार का व्रत रखते हुए शिव का रुद्राभिषेक करें।

चांदी या अष्टधातु का नाग बनवाकर उसकी अंगूठी हाथ की मध्यमा उंगली में धारण करें। किसी शुभ मुहुर्त मेंअपने मकान के मुख्य दरवाजे पर चांदी का स्वस्तिक एवं दोनों ओर धातु से निर्मित नाग चिपका दें।

🟣 10 घातक कालसर्प योग

केतु चतुर्थ तथा राहु दशम स्थान में हो तो घातक कालसर्प योग बनाते हैं। इस योग में उत्पन्न जातक यदि माँ की सेवा करे तो उत्तम घर व सुख की प्राप्ति होता है। जातक हमेशा जीवन पर्यन्त सुख के लिए प्रयत्नशील रहता है उसके पास कितना ही सुख आ जाये उसका जी नहीं भरता है। उसे पिता का भी विछोह झेलना पड़ता है। वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं रहता। व्यवसाय के क्षेत्रा में उसे अप्रत्याशित समस्याओं का मुकाबला करना पड़ता है। परन्तु व्यवसाय व धन की कोई कमी नहीं होती है। नौकरी पेशा वाले जातकों को सस्पेंड, डिस्चार्ज या डिमोशन के खतरों से रूबरू होना पड़ता है। साझेदारी के काम में भी मनमुटाव व घाटा उसे क्लेश पहुंचाते रहते हैं। सरकारी पदाधिकारी भी उससे खुश नहीं रहते और मित्र भी धोखा देते रहते हैं। यदि यह जातक रिश्वतखोरी व दो नम्बर के काम से बाहर आ जाएं तो जीवन में किसी चीज की कमी नहीं रहती हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा उसे जरूर मिलती है साथ ही राजनैतिक क्षेत्रा में बहुत सफलता प्राप्त करता है। उक्त परेशानियों से बचने के लिए जातक निम्नलिखित उपाय कर लाभ उठा सकते हैं।

अनुकूल उपाय –

नित्य प्रति हनुमान चालीसा का पाठ करें व प्रत्येक मंगलवार का व्रत रखें और हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर घुलाकर चढ़ाएं तथा बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं।

एक वर्ष तक गणपति अथर्वशीर्ष का नित्य पाठ करें।

शनिवार का व्रत रखें, श्री शनिदेव का तैलाभिषेक व पूजन करें और लहसुनियां, सुवर्ण, लोहा, तिल, सप्तधान्य, तेल, काला वस्त्रा, छिलके समेत सूखा नारियल, कंबल आदि का समय-समय पर दान करें

सोमवार के दिन व्रत रखें, भगवान शिव के मंदिर में चांदी के नाग की पूजा कर अपने पितरों का स्मरण करें और उस नाग को बहते जल में श्रध्दापूर्वक विसर्जित कर दें।

🟣 11- विषधार कालसर्प योग

केतु पंचम और राहु ग्यारहवे भाव में हो तो विषधर कालसर्प योग बनाते हैं। जातक को ज्ञानार्जन करने में आंशिक व्यवधान उपस्थित होता है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने में थोड़ी बहुत बाधा आती है एवं स्मरण शकित का प्राय: ह्रास होता है। जातक को नाना-नानी, दादा-दादी से लाभ की संभावना होते हुए भी आंशिक नुकसान उठाना पड़ता है। चाचा, चचेरे भाइयों से कभी-कभी मतान्तर या झगड़ा- झंझट भी हो जाता है। बड़े भाई से विवाद होने की प्रबल संभावना रहती है। इस योग के कारण जातक अपने जन्म स्थान से बहुत दूर निवास करता है या फिर एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करता रहता है। लेकिन कालान्तर में जातक के जीवन में स्थायित्व भी आता है। लाभ मार्ग में थोड़ा बहुत व्यवधान उपस्थित होता रहता है। वह व्यक्ति कभी-कभी बहुत चिंतातुर हो जाता है। धन सम्पत्तिा को लेकर कभी बदनामी की स्थिति भी पैदा हो जाती है या कुछ संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। उसे सर्वत्रा लाभ दिखलाई देता है पर लाभ मिलता नहीं। संतान पक्ष से थोड़ी-बहुत परेशानी घेरे रहती है। जातक को कई प्रकार की शारीरिक व्याधियों से भी कष्ट उठाना पड़ता है। उसके जीवन का अंत प्राय: रहस्यमय ढंग से होता है। उपरोक्त परेशानी होने पर निम्नलिखित उपाय करें।

🌹अनुकूलन उपाय –

श्रावण मास में 30 दिनों तक महादेव का अभिषेक करें।

सोमवार को शिव मंदिर में चांदी के नाग की पूजा करें, पितरों का स्मरण करें तथा श्रध्दापूर्वक बहते पानी या समुद्र में नागदेवता का विसर्जन करें।

सवा महीने देवदारु, सरसों तथा लोहवान – इन तीनों को जल में उबालकर उस जल से स्नान करें।

प्रत्येक सोमवार को दही से भगवान शंकर पर – ओउम् हर हर महादेव’ कहते हुए अभिषेक करें। ऐसा हर रोज श्रावण के महिने में करें।

सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाएं।

🟣 12 – शेषनाग कालसर्प योग

केतु छठे और राहु बारहवे भाव में हो तथा इसके बीच सारे ग्रह आ जाये तो शेषनाग कालसर्प योग बनता है। शास्त्राोक्त परिभाषा के दायरे में यह योग परिगणित नहीं है किंतु व्यवहार में लोग इस योग संबंधी बाधाओं से पीड़ित अवश्य देखे जाते हैं। इस योग से पीड़ित जातकों की मनोकामनाएं हमेशा विलंब से ही पूरी होती हैं। ऐसे जातकों को अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए अपने जन्मस्थान से दूर जाना पड़ता है और शत्रु षड़यंत्रों से उसे हमेशा वाद-विवाद व मुकदमे बाजी में फंसे रहना पड़ता है। उनके सिर पर बदनामी की कटार हमेशा लटकी रहती है। शारीरिक व मानसिक व्याधियों से अक्सर उसे व्यथित होना पड़ता है और मानसिक उद्विग्नता की वजह से वह ऐसी अनाप-शनाप हरकतें करता है कि लोग उसे आश्चर्य की दृष्टि से देखने लगते हैं। लोगों की नजर में उसका जीवन बहुत रहस्यमय बना रहता है। उसके काम करने का ढंग भी निराला होताहै। वह खर्च भी आमदनी से अधिक किया करता है। फलस्वरूप वह हमेशा लोगों का देनदार बना रहता है और कर्ज उतारने के लिए उसे जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। उसके जीवन में एक बार अच्छा समय भी आता है जब उसे समाज में प्रतिष्ठित स्थान मिलता है और मरणोपरांत उसे विशेष ख्याति प्राप्त होती है। इस योग की बाधाओं से त्राण पाने के लिए यदि निम्नलिखित उपाय किये जायें तो जातक को बहुत लाभ मिलता है।

🌹अनुकूलन के उपाय –

किसी शुभ मुहूर्त में ओउम् नम: शिवाय’ की 11 माला जाप करने के उपरांत शिवलिंग का गाय केदूध से अभिषेक करें और शिव को प्रिय बेलपत्रा आदि सामग्रियां श्रध्दापूर्वक अर्पित करें। साथ ही तांबे का बना सर्प विधिवत पूजन के उपरांत शिवलिंग पर समर्पित करें।

हनुमान चालीसा का 108 बार पाठ करें और मंगलवार के दिन हनुमान जी की प्रतिमा पर लाल वस्त्रा सहित सिंदूर, चमेली का तेल व बताशा चढ़ाएं।

किसी शुभ मुहूर्त में मसूर की दाल तीन बार गरीबों को दान करें।

सवा महीने जौ के दाने पक्षियों को खिलाने के बाद ही कोई काम प्रारंभ करें।

काल सर्प दोष निवारण यंत्र घर में स्थापित करके उसकी नित्य प्रति पूजा करें और भोजनालय में ही बैठकर भोजन करें अन्य कमरों में नहीं।

किसी शुभ मुहूर्त में नागपाश यंत्रा अभिमंत्रित कर धारण करें और शयन कक्ष में बेडशीट व पर्दे लाल रंग के प्रयोग में लायें।

शुभ मुहूर्त में मुख्य द्वार पर अष्टधातु या चांदी का स्वस्तिक लगाएं ।

ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ରେ ନିଳାଦ୍ରୀ ମହୋଦୟ ନୀତି।

ସମସ୍ତ ଓଡିଶାବାସୀଙ୍କୁ ହାର୍ଦ୍ଦିକ ଶୁଭେଛା , ମହାପ୍ରଭୁ ଜଗତର ନାଥ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥ ସମସ୍ତ ରୋଗ ଦୁଃଖ ମହାମାରୀକୁ ନାଶ କରନ୍ତୁ. ସମସ୍ତଙ୍କର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ ! ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ

ଭୂୟଃ ଶୃଣୂଷ୍ୱ ଦେବସ୍ୟ ନୀଳଶୈଳାଧିପସ୍ୟ ଚ ।
ମାଧବେ ସିତପକ୍ଷେ ଚ ହ୍ୟଷ୍ଟମ୍ୟାଂ ଯଦ୍ଦିନେ ନୃପଃ ॥
ପ୍ରାସାଦଘଟନାଂ ଚକ୍ରେ ତତସ୍ତୁ ପ୍ରତିବତ୍ସରମ୍ ।
ଯଥା ପୁଷ୍ୟାଭିଷେକସ୍ତୁ ତଦ୍ଦଉଚ୍ଚ ସମାଚରେତ୍ ॥

ଅର୍ଥାତ୍ ଏହି ତିଥିରେ ପ୍ରଭୁଙ୍କର ପ୍ରକଟ ହୋଇଥିବାରୁ ପ୍ରତିବର୍ଷ ପ୍ରକଟୋତ୍ସବ ଏହି ଦିନ ମହାସମାରୋହରେ ପାଳନ କରିବ ! ପୁଷ୍ୟାଭିଷେକରେ ଶ୍ରୀବିଗ୍ରହମାନଙ୍କର ଅଭିଷେକତ୍ସବ ପାଳନ କରାଯିବା ପରି ଏହି ଦିନ ମଧ୍ୟ ଅଧିବାସିତ ଜଳରେ ଅଭିଷେକ କରାଯାଏ !

ନୀଳାଦ୍ରି ମହୋଦୟ ଅଭିଷେକ ନିମିତ୍ତ ବୈଶାଖ ଶୁକ୍ଲ ପକ୍ଷ ସପ୍ତମୀରେ ରାତ୍ର ଚନ୍ଦନ ଲାଗି ନୀତି ଶେଷ ହେବା ପରେ ଭୋଗ ମଣ୍ତପ ଗୃହ ଧୋ ପଖାଳ ହୋଇ ଚାନ୍ଦୁଆଟିଏ ବନ୍ଧାଯାଇଥାଏ ! କୋଠ ଭୋଗ ପାଣିଆ ଯୋଗାଇଥିବା ଜଳ ଗଡୁମାନଙ୍କର ପୁର୍ଣ୍ଣ କରାଯାଇ ତହିଁରେ ସୁବାସିତ ପୁଷ୍ଫ ଓ ସରାମାନ ଘୋଡାଇ ଦିଆଯାଏ ! ଏହି ଜଳପୁର୍ଣ୍ଣ ଗଡୁଗୁଡିକ ଚାନ୍ଦୁଆ ତଳେ ଚାରି ପନ୍ତି କରି ରଖାଯାଏ ! ଏହାପରେ ଚେମେଡି ପତନି ପକାଇ ପୂଜାପଣ୍ତା ସେବକ ପୁଷ୍ପ, ଚନ୍ଦନ, ଦେଇ ଜଳ ଅଧିବାସ କରାନ୍ତି ! ଏହି ବିଧିମାନ ସଂପନ୍ନ ହେଲାପରେ ଚଢାଉକରଣ ସେବକ ଦ୍ୱାରମାନ ବନ୍ଦ କରି ମୁଦ ଦିଅନ୍ତି ଏବଂ ଲେଙ୍କା ଜଗିରହନ୍ତି ! ଏହାପରେ ଅନ୍ୟାନ ନୀତି ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୁଏ !

ଅଷ୍ଟମୀ ତିଥି ପୁର୍ବଦିନ ସପ୍ତମୀ ତିଥିରେ ରାତ୍ରିକାଳରେ ୧୦୮ଟି କୁମ୍ଭ ଜଳପୁରଣ କରି ବୀକ୍ଷଣାଦି ସଂସ୍କାର ପୂର୍ବକ ସେଥିରେ କର୍ପୁର ଗନ୍ଧ ପୁଷ୍ଫ ପ୍ରଭୃତି ନିକ୍ଷେପ କରି ବସ୍ତ୍ର ଦ୍ୱାରା ଆଛାଦନ କରିହେବ ! ତା ପରେ ତାକୁ ନେଇ ଅଧିବାସ ଗୃହରେ ସ୍ଥାପନ କରିବ !(ବାମଦେବ ସଂହିତା)

ଅଷ୍ଟମୀଦିନ ସକାଳ ଧୂପ ଓ ଆଲଟ ଲାଗି ସରିବା ପରେ ଭିତର ଗମ୍ଭୀରାରେ ପାଣି ପଡି ପୂଜା ଠା ହୋଇଥାଏ ! ପୂର୍ବ ଦିନରୁ ଭୋଗ ମଣ୍ତପ ଗୃହରେ ଅଧିବାସ ହୋଇଥିବା ୧୦୮ ଗଡୁ ଜଳକୁ ଗରାବଡୁ ସେବକ ମାନେ ମୁହଁରେ ବାଘମୁହାଁ ବାନ୍ଧି ଘଣ୍ଟ, ଛତା, କାହାଳୀ, ସହ ତଳିଛ ପଟୁଆରରେ ଚାରିଥରରେ ଚାରି ପନ୍ତି କରି ଜଳପୁର୍ଣ୍ଣ ଗଡୁମାନ ରତ୍ନସିଂହାସନ ନିକଟରେ ବିଜେ କରିବା ପରେ ଜଳ ପୂଜା ଓ ଲାଗି ନୀତି ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୁଏ ! ପୂଜାପଣ୍ତା ସେବକ ସଂସ୍କାର ପୂର୍ବକ ଜଳ ଲାଗି କରନ୍ତି ! ଜଳଲାଗି ଅବକାଶ ସମୟ ଭଳି ଦର୍ପଣ ଉପରେ ଲାଗି ହୋଇଥାଏ ! ଜଳ ଲାଗି ପରେ ମଇଲମ, ନୂଆଲୁଗା,ଲାଗି ହେବା ସହ ଘଟୁଆରୀ ଘର ଠାରୁ ତିନୋଟି ରୂପା ପିଙ୍ଗଣରେ ପୂଜାପଣ୍ତା , ପତିମହାପାତ୍ର, ଓ ମୁଦିରସ୍ତ ଚନ୍ଦନ ବିଜେ କରାଇ ଆଣି ସିଂହାସନ ଉପରେ ସଂସ୍କାର କରାଇ ପାଳିଆ ପୁଷ୍ଫାଳକଙ୍କ ସହ ଚନ୍ଦନ ସର୍ବାଙ୍ଗ କରାନ୍ତି ! ଏହାପରେ ଭିତରେ ପାଣି ପଡି ଧୁଆଜିବା ପରେ ମଧ୍ୟାହ୍ନ ଧୂପ ଓ ଯାତ ଭୋଗ ଘଣ୍ଟ ଛତା କାହାଳୀ ସହି ଶ୍ରୀଛାମୁକୁ ଆସିବା ପରେ ମୁଦିରସ୍ତ ପ୍ରସାଦ ଲାଗି କରିଥାନ୍ତି ଓ ଭୋଗ ସରିବା ପରେ ପାଣି ପଡି ଧୋପଖାଳ ହୋଇ ତିନି ବାଡରେ ବନ୍ଦାପନା ନୀତି ହୋଇଥାଏ ! ତତ୍ପରେ ପୂଜାପଣ୍ତା ଆଜ୍ଞାମାଳ ପ୍ରଦାନ କରିବା ପରେ ରାମ, କୃଷ୍ଣ, ମଦନମୋହନ, ଶ୍ରୀଦେବୀ,ଭୂଦେବୀ, ବିମାନ ଓ ପାଲିଙ୍କିରୁ ବିଜେ ପୂର୍ବକ ଚାପ କ୍ରୀଡା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ନରେନ୍ଦ୍ର ପୁଷ୍କରିଣୀକୁ ଗମନ କରିଥାନ୍ତି ।

ବୈଶାଖସ୍ୟାମଳେ ପକ୍ଷେ ଅଷ୍ଟମ୍ୟାଂ ପୁଷ୍ୟଯୋଗତଃ !
କୃତା ପ୍ରତିଷ୍ଠା ଭୋ ବିପ୍ରାଃ ଶୋଭନେ ଗୁରୁବାସରେ ॥
ତଦ୍ଦିନଂ ସୁମହତ୍ ପୁଣ୍ୟଂ ସର୍ବପାପ୍ରଣାଶନମ୍ !
ସ୍ନାନଂ ଦାନଂ ତପୋ ହୋମଃ ସର୍ବମକ୍ଷୟ୍ୟମଶ୍ନୁତେ ॥
ଶୁକ୍ଲାଷ୍ଟମୀ ଯା ବୈଶାଖେ ଗୁରୁପୁଷ୍ୟଯୁତା ଯଦା !
ତସ୍ୟାମଭ୍ୟର୍ଚନଂ ବିଷ୍ଣୋଃ କୋଟିଜନ୍ମାଘନାଶନମ୍ ॥ ( ନୀଳାଦ୍ରି ମହୋଦୟ)

The importance of Niladri Mahodaya is mentioned in the Skanda Purana-

“Baisakha Syamale Pakhye Ashtamyan Pushyajogatah

Kruta Pratishtha Bho Biprah Shobhane Gurubasare

Taddhinan Sumahat Punyan Sarbapapapranashanam

Snanan Danan Tapo Homah Sarbamokhyajyamashrute

Shuklashtami Ja Baisakhe Gurupushyajuta Jada

Tasyamabhyarchanan Bishnoh Koti Janmaghanaashanam”

Shri Bramha himself consecrated the deities on Thursday Pushyajukta Baisakha Shukla Ashtami.Therefore this a very pious day.If donation,bath or penance is done on this day,then great results are achieved.The devotees who have Darshan of Mahaprabhu on this day with utmost devotion get salvation.

Niladri_Mahodayashtami

ଟାହିଆ

ମଦନମୋହନଙ୍କଟାହିଆଚନ୍ଦନଯାତ୍ରା

ସ୍ନାନ,ରଥ,ବାହୁଡ଼ା ଓ ନୀଳାଦ୍ରି ବିଜେ ରେ ହେଉଥିବା ପହଣ୍ଡି ସମୟରେ ରାଘବ ଦାସ ମଠ ରୁ ଆସିଥିବା ଟାହିଆ ସମସ୍ତଙ୍କର ଦୃଷ୍ଟି ଆକର୍ଷଣ କରେ। ବାଉଁଶ,ସୋଲ, ଫୁଲ ଆଉ ତୁଳସୀ ରେ ତିଆରି ହୋଇଥିବା ବିରାଟ ଟାହିଆ ଭକ୍ତ ମାନଙ୍କୁ ଆକର୍ଷିତ କରିଥାଏ।

ସେହିପରି ଭାବରେ ଚନ୍ଦନ ଯାତ୍ରା ସମୟରେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଦିନ ମଦନମୋହନଙ୍କୁ ସୁନ୍ଦର ଟାହିଆ ଲାଗି ହେଇଥାଏ। ଏହି ଟାହିଆ କିନ୍ତୁ କୈାଣସି ମଠ ଦ୍ଵାରା ତିଆରି ହୁଏନି ବରଂ କାହିଁ ବହୁ ବର୍ଷରୁ ଦଇତାପଡା ସାହି ର ଶ୍ରୀ ଅବଧୂତ ପଟ୍ଟନାୟକ ଙ୍କ ପରିବାର ଦ୍ଵାରା ତିଆରି ହୁଏ।

ଏହି ବୈଷ୍ଣବ ପରିବାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ନିଷ୍ଠାର ସହ ଏହି ଟାହିଆ କରନ୍ତି। ଦେଖିବାକୁ ଟାହିଆ ଟି ଛୋଟ କିନ୍ତୁ ଏହା ପୁରା ଦିନ ଆଉ ବହୁତ ଲୋକଙ୍କ ର ପରିଶ୍ରମ ରେ ତିଆରି ହୁଏ।

ମଦନମୋହନଙ୍କ ର ଏହି ଟାହିଆ ପାଇଁ ବର ପତ୍ର, ଖଡ଼ିକା, କଦଳୀ ପଟୁକା, ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାରର ସୁଗନ୍ଧିତ ଫୁଲ ର କଢ ର ଆବଶ୍ୟକତା ପଡ଼ିଥାଏ। ଚନ୍ଦନ ଯାତ୍ରା ରେ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ର ଟାହିଆ ସମସ୍ତ ବାସ୍ନା ଫୁଲର କଢରେ ତିଆରି ହୁଏ। ବଉଳ ଫୁଲ, ଗୋଲାପ ସହ ମଲ୍ଲି, ଯୁଇ,ଯାଇ, ଚମ୍ପା, କାଠ ରଙ୍ଗଣୀ, ଅଁଳେଇ ଇତ୍ୟାଦି ର କଢ ସଂଗ୍ରହ କରାଯାଏ।

ଟାହିଆ ଟି ଛୋଟ ହୋଇଥିବାରୁ ଏଥିରେ ହେଉଥିବା କାରୁକାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ସୂକ୍ଷ୍ମ । ବିଭିନ୍ନ ଆକୃତି ର ଛାଞ୍ଚ ରେ ଅତି ସତର୍କତାର ସହ ବର ପତ୍ର ଗୁଡ଼ିକୁ କଟାଯାଏ।ତା’ ପରେ ସେହି ପତ୍ର ରେ ଫୁଲ ର କଢ ଗୁଡ଼ିକୁ କଦଳୀ ପଟୁକା ଓ ସୂକ୍ଷ୍ମ ଛୁଞ୍ଚି ସାହାଯ୍ୟରେ ଗୁନ୍ଥା ଯାଏ। ଏହିପରି ବିଭିନ୍ନ ଆକୃତି ର ଫୁଲକଢର ରେଖାଚିତ୍ରକୁ ଖଡ଼ିକା କାଠି ରେ ଗୁନ୍ଥି ଏକ ସୁନ୍ଦର ମନୋହର ଟାହିଆ ର ରୂପ ଦିଆଯାଏ। ସନ୍ଧ୍ୟା ସମୟରେ ଠାକୁର ଏ ଟାହିଆ ଟି ପିନ୍ଧିବା ସମୟରେ ସେଇ କଢ ଗୁଡ଼ିକ ଆସ୍ତେ ଆସ୍ତେ ଫୁଟି ଅପୂର୍ବ ଦେଖାଯାଆନ୍ତି।

ଏହି କାର୍ଯ୍ୟ ପାଇଁ ଏକାଗ୍ରତା ଓ ନିଷ୍ଠା ସହ ସମର୍ପଣ ମଧ୍ୟ ଆବଶ୍ୟକ। ଶ୍ରୀଯୁକ୍ତ ପଟ୍ଟନାୟକ ଙ୍କ ପରିବାର, ବନ୍ଧୁ ବାନ୍ଧବ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ବୈଷ୍ଣବ ଏହି ଟାହିଆ ତିଆରି ରେ ନିଜକୁ ନିୟୋଜିତ କରି ଧନ୍ୟ ମନେ କରନ୍ତି। ସମସ୍ତେ ନିୟମ ମାନି ଶୃଙ୍ଖଳିତ ଭାବରେ ଏହି ଟାହିଆ ତିଆରି କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପାଦିତ କରିଥାନ୍ତି।

@ସଂଗୃହିତ

❣️ଦଧିନଉତିର ଚିତା❣️

ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥ ମନ୍ଦିରର ଦଧିନଉତିରେ ଏକ ତ୍ରିଶାଖା ଚିତା ଅଙ୍କିତ ହୋଇଛି। ଏହାକୁ କେତେକ ‘ରାମାନନ୍ଦୀ ଚିତା’ ବୋଲି କହନ୍ତି। ପ୍ରକୃତରେ କିନ୍ତୁ ଏହା ‘ରାମାନୁଜୀ ଚିତା’। ଭାରତବର୍ଷର ବୈଷ୍ଣବଧାରାରେ ‘ରାମାନୁଜ’ ଓ ‘ରାମାନନ୍ଦ’ ନାମରେ ଦୁଇଜଣ ରାମ ଉପାସକ ବୈଷ୍ଣବ ଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ରାମାନୁଜ ଅଗ୍ରଜ। ତାଙ୍କର ସମୟ ଏକାଦଶ-ଦ୍ୱାଦଶ ଶତାବ୍ଦୀ। କିନ୍ତୁ ରାମାନନ୍ଦଙ୍କର ସମୟ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶ ଶତାବ୍ଦୀ। ବୈଶାଖ ଶୁକ୍ଳ ଷଷ୍ଠୀ ତିଥିରେ ରାମାନୁଜଙ୍କର ଆବିର୍ଭାବ ଘଟିଥିଲା।

ରାମାନୁଜ ଥିଲେ ସୁପଣ୍ଡିତ। ସେ ବେଦ, ଉପନିଷଦ ଆଦି ଅଧ୍ୟୟନ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ‘ବିଷ୍ଣୁପୁରାଣ’ ଓ ‘ଭାଗବତ ପୁରାଣ’ ଥିଲା ତାଙ୍କର ଦିବ୍ୟଗ୍ରନ୍ଥ। ଏସବୁର ମହତ୍ତ୍ୱ ତାଙ୍କର ଦୃଷ୍ଟିକୋଣକୁ ପରିମାର୍ଜିତ କରିଥିଲା। ତାଙ୍କର ମତ ଥିଲା- ପୁରୁଷୋତ୍ତମ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥ ସମସ୍ତ ଅଶୁଭଗୁଣ ମୁକ୍ତ ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ କଲ୍ୟାଣଗୁଣ ଯୁକ୍ତ। ସେ ବ୍ରହ୍ମ ହେଲେ ହେଁ ନିର୍ଗୁଣ ନୁହନ୍ତି। ସେଥିପାଇଁ ସେ ବିଗ୍ରହ ଧାରଣ କରିଛନ୍ତି। ଭକ୍ତଙ୍କ ପ୍ରତି ଅନୁଗ୍ରହ କରି ସେ ମୂର୍ତ୍ତି ବା ପ୍ରତିମାରେ ପ୍ରକଟ ହୋଇଛନ୍ତି।

ଭାରତବର୍ଷର ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ତୀର୍ଥ ଭ୍ରମଣ କରିବା ପରେ, ରାମାନୁଜ ଓଡ଼ିଶା ଆସିଥିଲେ। ଶ୍ରୀକ୍ଷେତ୍ର ପୁରୀରେ ରହି ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ପୂଜାବିଧିରେ କେତେକ ପରିବର୍ତ୍ତନ କରିବାକୁ ଚାହିଁଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ଗଙ୍ଗବଂଶୀ ରାଜା ଚୋଡ଼ଗଙ୍ଗଦେବ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରଭାବିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ପୂଜାବିଧିରେ ବିଶେଷ ପରିବର୍ତ୍ତନ ଘଟିପାରି ନଥିଲା। ତେବେ ତାଙ୍କର ପ୍ରଭାବରେ ଦେବୀ ଲକ୍ଷ୍ମୀଙ୍କ ପାଇଁ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପରିସରରେ ଏକ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ମନ୍ଦିର ପ୍ରତିଷ୍ଠା ହୋଇଥିଲା। ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରର ଦଧିନଉତିରେ ରାମାନୁଜୀ ଚିତା ସେହି ସମୟରୁ ଶୋଭାପାଉଛି। ପଣ୍ଡିତ ନୀଳକଂଠ ଦାସ ଏ ସଂପର୍କରେ ଲେଖିଛନ୍ତି- ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ଦଧିନଉତିର ବେଣ୍ଟଲଗା ତ୍ରିଶାଖା ଚିତା ହେଉଛି ରାମାନୁଜୀ ଚିତା। ତାଙ୍କରି ପ୍ରଭାବରେ ଗଙ୍ଗବଂଶର ଆଦି ରାଜାମାନେ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ଖଟଣିରେ ଦେବଦାସୀ ବା ମାହାରୀ ପ୍ରଥାର ପ୍ରବେଶ ଘଟାଇଥିଲେ।

ଏ ସଂପର୍କରେ ବିଶେଷ ଉଲ୍ଲେଖନୀୟ ଯେ ଦେବଦାସୀ ବା ମାହାରୀମାନେ ସେମାନଙ୍କ ବେଶଭୂଷାରେ, ମସ୍ତକରେ ଯେଉଁ ତ୍ରିଶାଖା କିରୀଟ ପିନ୍ଧୁଥିଲେ- ତାହା ଏହି ରାମାନୁଜୀ ତ୍ରିଶାଖା ଚିତାର ଏକ ପ୍ରତୀକ।

✿❁❣️ ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ଶରଣଂ ❣️❁✿

ଆମ ମହାପ୍ରଭୁ ଜଗନ୍ନାଥ କଳା କାହିଁକି ?

ଆମ ମହାପ୍ରଭୁ ଜଗନ୍ନାଥ କଳା କାହିଁକି ?

ବିଜ୍ଞାନ ସାତୋଟି ରଙ୍ଗ ପ୍ରମାଣ ଦେଇଛି (ବା ଘ ନି ଶ ହ ନା ଲା ) ଯେଉଁଥିରେ କଳା ଓ ଧଳା ନାହିଁ ।

ବିଜ୍ଞାନ ପ୍ରମାଣିତ ସବୁଯାକ ରଙ୍ଗକୁ ମିଶାଇଲେ କଳା ରଙ୍ଗର ଉତ୍ପତ୍ତି ହୁଏ , ଅର୍ଥାତ ଏଥିରୁ ପ୍ରମାଣିତ ହୁଏ କି କଳାରଙ୍ଗ (ଧଳା ରଙ୍ଗକୁ ଛାଡି ) ବାକି ରଙ୍ଗର ଜନନୀ । କିନ୍ତୁ କଳା ଓ ଧଳାକୁ ରଙ୍ଗରେ ଗଣନା କରାଯାଇ ନାହିଁ।

ଧଳାର ଆଗମନରେ ହିଁ କଳାର ଉପସ୍ଥିତି ଜ୍ଞାତ ହୁଏ । ଏଠାରେ ଧଳା କହିଲେ ପ୍ରକାଶକୁ ବୁଝାଏ ଓ କଳା କହିଲେ ପ୍ରକାଶର ଆଧାରକୁ ବୁଝାଏ । ପୁଣି ପ୍ରକାଶ କହିଲେ ଜ୍ଞାନକୁ ବୁଝାଏ ।

ପ୍ରକାଶର ଆଗମନରେ ବା ଜ୍ଞାନର ଆଗମନରେ ହିଁ ପ୍ରକାଶର ଆଧାର କଳାକୁ ବା ଅଖଣ୍ଡ ଜ୍ଞାତାଙ୍କୁ ଜାଣିବାର ସାମର୍ଥ୍ୟ ମିଳେ ।

ପୁନଶ୍ଚ…..

ଏଠାରେ, କଳାରଙ୍ଗକୁ ସବୁରଙ୍ଗର ଜନନୀ କହିବାର, ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଅର୍ଥ ହେଉଛି ଜାତି ଧର୍ମ ବର୍ଣ୍ଣ ନିର୍ବିଶେଷରେ ମହାପ୍ରଭୁ ଜଗନ୍ନାଥ ସମସ୍ତଙ୍କର ଉଦଗମ ସ୍ଥଳ , ଅର୍ଥାତ ଜଗତର ଆଧାର ଅଟନ୍ତି । ତେଣୁ …..

ସେ ଏକ ହେଲେ ବି ଅନେକ ଭଳି ପ୍ରତିତୀ ହେବାରେ ଅସୁବିଧା କେଉଁଠି ନାହିଁ କାରଣ ଯାଦୃଶି ଭାବନା ଯସ୍ଯ ସିଦ୍ଧିଃ ଭବତି ତାଦୃଶି ! ସେଥିପାଇଁ ଏକୋ ଦେବ, ବିପ୍ରାଃ ବହୁଧା ବଦନ୍ତି !

ଅର୍ଥାତ ଏହି ସୂତ୍ରର ଆଧାରରେ…..

ଆମର ଯେଉଁ ସପ୍ତଚକ୍ର ତାହା ସାତୋଟି ପଦ୍ମର ସୂଚନା ଦେଇ ପ୍ରତ୍ଯେକକୁ ଭିନ୍ନଭିନ୍ନ ଦଳ ବା ପାଖୁଡାରେ ବିଭକ୍ତ କରି ଏହାକୁ ଉପରୋକ୍ତ ସାତୋଟି ରଙ୍ଗର ଅଧିଷ୍ଠାନ କେନ୍ଦ୍ର ରୂପରେ ବିଭକ୍ତ କରାଯାଇଛି ।

ଏବଂ …..

ସହସ୍ରାର ଉର୍ଦ୍ଧ୍ବରେ ସମସ୍ତଙ୍କ ଅଧିଷ୍ଠାନ କଳାରଙ୍ଗ ହେତୁ ଏହା ସହସ୍ରାଧିକ ରଙ୍ଗର ସମାବେଶ ହୋଇଥାଏ , ତଥାପି ସାଧକଙ୍କ ଜ୍ଞାନରେ ( ପ୍ରକାଶରେ )ସମସ୍ତଙ୍କ ଅଧିଷ୍ଠାନ ଜ୍ଞାତା ଏକ ଥିଲେ ବି ଏହା ଅନେକ ପ୍ରତିତୀ ହୁଏ ବୋଲି ଏହା ସହସ୍ରାର ଚକ୍ର ବା ସହସ୍ରାର କେନ୍ଦ୍ର ବୋଲାଯାଏ । ତାତ୍ପର୍ଯ୍ଯ ….

ଉଭୟ ନିର୍ବିକଳ୍ପ ଓ ସବିକଳ୍ପରେ କଳାର ବୈଶିଷ୍ଠତାକୁ ଲକ୍ଷରଖି ଆମ ମହାପ୍ରଭୁ କଳାରଙ୍ଗ ହୋଇ କଳାଶ୍ରୀମୁଖ ଭାବରେ ପ୍ରକଟ ଲୀଳା କରୁଛନ୍ତି ।

ଚନ୍ଦନଯାତ୍ରା ମାଣ୍ଡୁଅ ଭୋଗ

#ଚନ୍ଦନଯାତ୍ରା

ମାଣ୍ଡୁଅ ଭୋଗ

ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟାଠାରୁ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥାଏ ଚନ୍ଦନ ଯାତ୍ରା। ଏହି ଯାତ୍ରାର ଅବଧି ହେଉଛି ୪୨ ଦିନ। ଏହି ସମୟରେ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ ବିରାଜିତ ଦାରୁ ବିଗ୍ରହମାନଙ୍କୁ ଚନ୍ଦନ ଲାଗି ବେଶ କରାଯାଉଥିବା ବେଳେ, ଦ୍ୱିପ୍ରହର ଧୂପ ପରେ ଠାକୁରଙ୍କ ନୌକା ବିହାର ବା ଚାପଖେଳ ପାଇଁ ପ୍ରକ୍ରିୟା ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥାଏ।
: ଶ୍ରୀଅଙ୍ଗରୁ ଆଜ୍ଞାମାଳ ପାଇ ମଦନ ମୋହନ, ଭୂଦେବୀ, ଶ୍ରୀଦେବୀ ଓ ରାମକୃଷ୍ଣ ଶ୍ରୀକ୍ଷେତ୍ରର ଆରାଧ୍ୟ ପଞ୍ଚ ମହାଦେବଙ୍କ ସହ ନରେନ୍ଦ୍ର ସରୋବରରେ ଚାପ ଖେଳିଥାନ୍ତି। ଏହି ସମୟରେ ଠାକୁରମାନଙ୍କ ପାଖରେ ୨ଟି ପାରମ୍ପରିକ ପ୍ରସାଦ ଲାଗି ହୋଇଥାଏ। ଗୋଟିଏର ନାଁ ମାଣ୍ଡୁଅ ଓ ଅନ୍ୟଟି ହେଉଛି କେଳି। ଏହି ଦୁଇ ମିଷ୍ଠାନ୍ନ ପ୍ରସାଦ କେମିତି ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୁଏ ଆସନ୍ତୁ ଜାଣିବା।

ମାଣ୍ଡୁଅ – ଛେନା, ଅଟା, ଅଳେଇଚ, ଲବଙ୍ଗ, କର୍ପୁର ଓ ଚିନିରେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଗୋଲାକାର ମିଷ୍ଠାନ୍ନ ହେଉଛି ମାଣ୍ଡୁଅ। ଚିନି, ଲବଙ୍ଗ ଓ ଅଳେଇଚ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ କରି ଗୁଣ୍ଡ କରି ଚୂରି ଦିଆଯାଏ। ତା ପରେ ଛେନାକୁ ଚିପୁଡି ଏଥିରେ ଅଟା ଅଳ୍ପ ଅଳ୍ପ କରି ଗୋଳାଇ ଦିଆଯାଏ। ଏହି ଗୋଳାରେ ମିଶାଇ ଦିଆଯାଏ ଅଳେଇଚ, ଲବଙ୍ଗ ଓ କର୍ପୁର ଗୁଣ୍ଡ। ଏହି ମିଶ୍ରଣକୁ ଗୁଳା ଗୁଳା କରି କଦଳୀ ପତ୍ରରେ ରଖି ଏହାକୁ ଘିଅରେ ଛଣାଯାଏ ଏବଂ ଶେଷରେ ଏଥିରେ ଚିନି ଗୁଣ୍ଡ ଛିଞ୍ଚି ଦିଆଯାଏ। ମହାପ୍ରଭୁ ଚାପରେ ବିଜେକରି ଜଳକ୍ରୀଡା କରିବା ପରେ ଏହି ସୁସ୍ୱାଦୁ ମାଣ୍ଡୁଅ ପ୍ରସାଦ ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିଥାନ୍ତି।

କେଳି: ଏହି ନାଁରୁ ହିଁ ଆପଣ ବାରି ପାରୁଥିବେ ଏହି ସୁନ୍ଦର ଓ ସୁସ୍ୱାଦୁ ଦିବ୍ୟ ବ୍ୟଞ୍ଜନର ସ୍ୱରୂପକୁ। ବାସ୍ତବରେ ପାଣିରେ ହଂସଟିଏ ପହଁରିବା ବେଳେ ଯେଉଁ ଜଳ ତରଙ୍ଗ ସୃଷ୍ଟି ହୁଏ ତାହାର ପ୍ରତିକୃତି ହେଉଛି ଏହି ବ୍ୟଞ୍ଜନ। ବିରି, ନଡିଆ, ଚାଉଳ ଚୂନା, ଗୁଡ଼, କର୍ପୁର ଓ ଅଳେଇଚରେ ଏହି ଦିବ୍ୟ ବ୍ୟଞ୍ଜନ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥାଏ।
ପ୍ରଥମେ ନଡ଼ିଆ କୋରାଯାଇ ରଖାଯାଏ। ଏହାକୁ ଗୁଡ଼ ପାଗରେ ପକାଇ କର୍ପୁର ଓ ଅଳେଇଚ ଗୋଲାଇ ପୁର ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଏ। ଏହାପରେ ଚାଉଳ ଚୂନା ଓ ବିରି ମିଶାଇ ମଣ୍ଡାପିଠା ଭଳି ଆକୃତି ଦିଆଯାଏ। ଏହା ମଧ୍ୟରେ ଉପରୋକ୍ତ ପୁର ପକାଇ ଘିଅରେ ଛଣାଯାଏ। ମାଣ୍ଡୁଅ ସହ ଏହାକୁ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ପରସି ଦିଆଯାଏ। ଏହି ପ୍ରସାଦ ପାଇବା ପରେ ଠାକୁରମାନେ ପୁନଃ ରାତିଚାପକୁ ବିଜେ କରିଥାନ୍ତି।

ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ 🙏

# চন্নাতযাত্রা

# মান্দুয়া ভোগ .

অক্ষয় তৃতীয় থেকে মন্দিরে চন্দন যাত্রা শুরু হয়। যাত্রার সময়সীমা 42 দিন। এই সময়ে, মন্দিরে কাঠের মূর্তিগুলি চন্দন কাঠের পোশাক পরে, ঠাকুরের নৌকা বিহার বা চাপের খেলাটির জন্য দুপুরের ধূপের পরে শোভাযাত্রা শুরু হয়।
: শ্রীক্ষেত্রের পাঁচ মহাদেবের আনুগত্যকারী মদন মোহন, ভূদেবী, শ্রীদেবী এবং রামকৃষ্ণ নরেন্দ্র সরোবরের চাপে রয়েছেন। এই সময়ে, ঠাকুরের দুটি traditionalতিহ্যবাহী অফার রয়েছে। একটির নাম মন্দুয়া এবং অন্যটির নাম কেলি। আসুন জেনে নেওয়া যাক কীভাবে এই দুটি মিষ্টি প্রস্তাব দেওয়া হয়।

মান্দুয়া – মান্দুয়া হল গোলাকার মিষ্টি যা চেডার, ময়দা, এলাচ, লবঙ্গ, কর্পূর এবং চিনি দিয়ে তৈরি। চিনি, লবঙ্গ এবং এলাচি কুচি দিয়ে পিষে দেওয়া হয়। এর পরে চেডার চেপে চেপে ধরে আটা দিয়ে আটা করে দেওয়া হয়। এই বৃত্তিতে ওটমিল, লবঙ্গ এবং কর্পূর গুঁড়ো যুক্ত করা হয়। মিশ্রণটি কলা পাতাগুলিতে ঘি মধ্যে ঘেরা হয় এবং অবশেষে চিনির গুঁড়ো ছড়িয়ে দেওয়া হয়। প্রভু চাপের মধ্যে পানির খেলা খেলে এই সুস্বাদু মান্দুয়া প্রসাদ গ্রহণ করেন।

কেলি: এই নামটি থেকে আপনি এই সুন্দর এবং সুস্বাদু divineশ্বরিক থালায় ফিরে যেতে পারেন। আসলে, থালাটি হংস জলে সাঁতার কাটার সময় সৃষ্টি হওয়া জলের তরঙ্গের প্রতিচ্ছবি। এই divineশ্বরিক থালাটি মটরশুটি, নারকেল, চালের চুন, আঠা, কর্পূর এবং এলাচ দিয়ে তৈরি করা হয়।
প্রথমে নারকেলটি একটি ঝুড়িতে রাখা হয়। এটি একটি ভাল আবহাওয়ায় কর্পূর এবং এলাচ ছুঁড়ে দিয়ে তৈরি করা হয়। চালটি চুন এবং মটরশুটি মিশিয়ে মণ্ডপীঠ তৈরি করে। এরই মধ্যে উপরের পুরটি ঘি .েলে দেওয়া হয়। এটি মান্দুয়া দিয়ে পরিবেশন করা হয় এবং প্রভুর সামনে উপস্থাপিত হয়। এই প্রসাদম প্রাপ্তির পরে, ঠাকুররা রাতের চাপ ফিরে পান।

জয় জগন্নাথ

ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରେ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କର ପୁଷ୍ୟାଭିଷେକ (ପୌଷପୂର୍ଣ୍ଣିମା) ଓ ରାଜରାଜେଶ୍ଵର ବେଶ

ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରେ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କର ପୁଷ୍ୟାଭିଷେକ (ପୌଷପୂର୍ଣ୍ଣିମା) ଓ ରାଜରାଜେଶ୍ଵର ବେଶ

ପୁଷ୍ୟାଭିଷେକ ଉତ୍ସବ ପୌଷପୂର୍ଣ୍ଣିମା ଦିନ ପାଳନ କରାଯାଉଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଏହି ଉତ୍ସବ ଆନୁଷଙ୍ଗିକ ଅଙ୍କୁରାରୋପଣ କର୍ମ ପୌଷ ଶୁକ୍ଳ ଏକାଦଶୀ ଦିନ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ ସନ୍ଧ୍ୟାଧୂପ ପରେ ଦେଉଳ ପୁରୋହିତଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମାହିତ ହୋଇଥାଏ।
ପୌଷପୂର୍ଣ୍ଣିମା ପୂର୍ବଦିନ ଚନ୍ଦନଲାଗି ନୀତି ପରେ ଅଧିବାସ କର୍ମ କରାଯାଏ। ଏଥିପାଇଁ ଭୋଗମଣ୍ଡପ ଘର ଧୋପଖାଳ ହୋଇ ଚାନ୍ଦୁଆ ବନ୍ଧା ଯାଇଥାଏ। ଏକ ହାଣ୍ଡି ଘିଅ ଓ ରୋଷକୂପରୁ ନୂଆହାଣ୍ଡିରେ ଅଣାଯାଇଥିବା ପାଣି ପରଖମାନଙ୍କରେ ରଖାଯାଇଥାଏ। ଘିଅକୁ ଏକୋଇଶ ଗରାରେ ଓ ପାଣିକୁ ସତାଅଶୀ ଗରାରେ ବିଭକ୍ତ କରାଯାଇ ଚାରି ପନ୍ତି ହୋଇ ଚାନ୍ଦୁଆତଳେ ରଖାଯାଏ। ଏହି ଗରାମାନଙ୍କୁ ଦେଉଳ ପୁରୋହିତ ଚେମେଡ଼ି ପତନି ଘୋଡ଼ାଇ ଫୁଲ ଚନ୍ଦନ ଦେଇ ଅଧିବାସ କରନ୍ତି। ପରେ ଭୋଗମଣ୍ଡପ ଦ୍ୱାର ବନ୍ଦହୋଇ ତଡ଼ଉକରଣ ମୁଦ ଦିଅନ୍ତି। ପରେ ପରେ ବଡ଼ସିଂହାର ଭୋଗ ପୂଜା ସରିବା ପରେ ପାଣି ପଡ଼ି ଧୋପଖାଳ ହୋଇ ଭଦ୍ରାସନ ଉପରେ ପାହାଡ଼ା ପଡ଼ି ଅଧିବାସ ଦର୍ପଣ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ମନ୍ତ୍ରପୁତ ପୁଷ୍ପ ଓ ଚନ୍ଦନାଦି ଦ୍ୱାରା ଅଧିବାସ ହୁଏ। ଏକାଦଶୀ ଦିନ ଦେଉଳ ପୁରୋହିତ ସ୍ନାନବେଦୀ ପାଖରେ ଅଙ୍କୁରାରୋପଣ ପୂଜା କରିଥିବେ।
ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ଭିତରବେଢାରେ ଥିବା ପ୍ରତିହାରୀ ନିଯୋଗ କାର୍ଯ୍ୟାଳୟ ଗୃହ ସମ୍ମୁଖରେ କୋଠସୁଆଁସିଆଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଏକ ଯଜ୍ଞଶାଳା ନିର୍ମିତ ହୋଇଥାଏ। ପୂର୍ଣ୍ଣିମା ଦିନ ସକାଳଧୂପ ପୂଜା ବସିଥିବା ବେଳେ ଏଠାରେ ହୋମ କରାଯାଏ। ଭିତରେ ସକାଳଧୂପ ଶେଷ ପରେ ପାଣିପଡ଼ିବା ପରେ କେବଳ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ବାଡ଼ରେ ମୈଲମ ହୋଇ ତଡ଼ପ ଉତ୍ତରୀ ଲାଗି କରାଯାଏ। ପରେ ମହାସ୍ନାନ ପୂଜା ଠା’ ହୁଏ। ଗତଦିନରେ ଅଧିବାସ ହୋଇଥିବା ଭୋଗମଣ୍ଡପ ଘରର ମୁଦ ଖୋଲାଯାଇ ରୋଷଘରୁ ନିଆଁ ଅଣାଯାଏ ଓ ସେଥିରେ ଘିଅକୁ ତରଳାଯାଇ କୁମ୍ଭମାନଙ୍କରେ ଥିବା ପାଣିରେ ମିଶାଯାଏ। ଟେରାବନ୍ଧା ପରେ ଭୋଗମଣ୍ଡପ ଘରଠାରୁ ଜଳଛେକ ଗରାବଡୁମାନେ ବାଘମୁହାଁ ବାନ୍ଧି ଘଣ୍ଟ ଛତା କାହାଳୀ ସହ ତଳିଛ ପ୍ରଧାନୀ ପଟୁଆରରେ ଆସି ଚାରିଥରେ ଚାରିଟି ପନ୍ତିରେ ରଖନ୍ତି।
ଏହା ପରେ ଶୀତଳ ଭୋଗ ଛେକ ଆସେ। ତା’ପରେ ମୁଦିରସ୍ତ ଶ୍ରୀଅଙ୍ଗରେ ପ୍ରସାଦଲାଗି କରନ୍ତି। ପୂଜାପଣ୍ଡା ଓ ଦେଉଳ ପୁରୋହିତ ପାତ୍ରି, ଅଧିବାସ ଦର୍ପଣ ପାଖରେ ଧରିଥାନ୍ତି। ଗରାବଡୁମାନେ ଘିଅ ଓ ଜଳ ଉକ୍ତ ପାତ୍ରିରେ ଦେଇ ଦର୍ପଣ ଉପରେ ଲାଗି କରାନ୍ତି (କେବଳ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ବାଡ଼ରେ)। ପାଣି ପଡ଼ିବା ପରେ ପୁଷ୍ପାଳକମାନେ ମଇଲମ କରି ନୂଆ ଲୁଗା ଲାଗି କରିବା ପରେ ପଣ୍ଡା, ପତି, ମୁଦିରସ୍ତ ସର୍ବାଙ୍ଗ ଲାଗି କରାନ୍ତି। ଏହା ପରେ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ଆଜ୍ଞାମାଳ ପାଇ ପାଲିଙ୍କିରେ ଯାଇ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ମନ୍ଦିରର ଜଗମୋହନରେ ଖଟ ଉପରେ ବିଜେ ହୁଅନ୍ତି। ସେଠାରେ ତାଙ୍କର ମାଜଣା, ଚନ୍ଦନଲାଗି ବେଶ ହୁଏ ।ଏହା ପରେ ଭିତରେ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କର ଅଭିଷେକ ବେଶ, ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣ ଅଳଙ୍କାର ଲାଗି, ମାଳଫୁଲ କର୍ପୂର ଲାଗି ପରେ ରୋଷଘରୁ ଘଣ୍ଟ ,ଛତା, କାହାଳୀ, ପଟୁଆରରେ ପୁଷ୍ୟାଭିଷେକ ଯାତ୍ରାଙ୍ଗୀ ଭୋଗ ଛାମୁକୁ ଆସେ। ଏହା ପରେ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ବାହୁଡ଼ାବିଜେ ହୋଇ ଭିତର ସିଂହାସନକୁ ବିଜେ କରନ୍ତି। ମୁଦିରସ୍ତ ପ୍ରସାଦ ଲାଗି କରନ୍ତି ଓ ଦଣ୍ଡଛତ୍ର ସଂସ୍କାର କରି ଭିତରଚ୍ଛ ମହାପାତ୍ର ସିଂହାସନ ଉପରକୁ ଉଠିଲେ ତାଙ୍କୁ ଦିଅନ୍ତି। ଭିତରଚ୍ଛ ସିଂହାସନ ଉପରେ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କ ସ୍ୱରୂପ ଠିଆହୋଇ ଦଣ୍ଡଛତ୍ର ଧରନ୍ତି। ପାଳିଆ ଭଣ୍ଡାରମେକାପ ହନୁମାନ ସ୍ୱରୂପ ଦଣ୍ଡଛତ୍ର ମୂଳକୁ ଧରନ୍ତି। ପୂଜାପଣ୍ଡା ଆସି ଷୋଡ଼ଶ ଉପଚାରରେ ପୂଜା କରନ୍ତି। ଭୋଗସରି ପାଣି ପଡ଼ିଲେ ପଣ୍ଡା, ପତି, ମୁଦିରସ୍ତ ତିନିବାଡ଼ରେ ବନ୍ଦାପନା କରନ୍ତି। ମୁଦିରସ୍ତ ଫୁଲ ଶର ଆୟୁଧ ଲାଗି କରନ୍ତି। ପରେ ସେ ସିଂହାସନ ଉପରେ ଚାମର ଆଲଟ କରନ୍ତି। ତା’ପରେ ସିଂହାସନ ତଳେ ମଧ୍ୟ ଆଲଟ ଲାଗି ଓ ଘଷା ବିଡ଼ିଆ ଦହି ମଣୋହି କରନ୍ତି। ଅଖଣ୍ଡ ମେକାପ ବଇଠା ହାତରେ ଧରି ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କ ବାଡ଼ରେ ଠିଆ ହୋଇଥାନ୍ତି। ରାଜନୀତି ଓ ବନ୍ଦାପନା ସରିବା ପରେ ମୁଦିରସ୍ତ ସିଂହାସନ ଉପରକୁ ଫୁଲ ଧନୁଶର ଓ ଗଦି ପ୍ରସାଦ ମଇଲମ କରନ୍ତି। ଭିତରଚ୍ଛ ଦଣ୍ଡଛତ୍ର ମଇଲମ କରି ତଳକୁ ଦିଅନ୍ତି। ଏ ଉତ୍ତାରୁ ଦକ୍ଷିଣଘର ଭୋଗ ଶେଷ ପରେ ରଘୁନାଥ ଠାକୁର ରତ୍ନସିଂହାସନକୁ ବିଜେ କରନ୍ତି। ସେ ଶ୍ରୀଅଙ୍ଗରୁ ଆଜ୍ଞାମାଳ ପାଇବାପରେ ଲକ୍ଷ୍ମୀମନ୍ଦିରକୁ ବାହାର ଅଭିଷେକ ପାଇଁ ବିଜେ କରନ୍ତି। ସେଠାରେ କାଠ ଭଦ୍ରାସନରେ ଵିଜେ ହେବା ପରେ ମହାସ୍ନାନ ହୁଏ। ଭୋଗ ବନ୍ଦାପନା ହୋଇ ଦକ୍ଷିଣ ଘରକୁ ବାହୁଡା ବିଜେ କରନ୍ତି।

ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରେ ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ନୀତି :-

ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରେ ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ନୀତି :-

ଯଥା ଦେହେ ତଥା ଦେବେ। ଉକ୍ତ ଲୋକମୁଖ ରେ ବହୁଳ ଭାବରେ ପ୍ରଚଳିତ ଥିବା ଉକ୍ତି ଟି ର ସାର୍ଥକତା ପ୍ରତିପାଦିତ କରିବାକୁ ଯାଇ ଲୀଳାମୟ ମହାପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ଗ୍ରୀଷ୍ମ କାଳ ରେ ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଉତ୍ତାପ ରେ ଅତିଷ୍ଠ ହୋଇ ବୈଶାଖ ଶୁକ୍ଳ ତୃତୀୟା ବା ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ଠାରୁ ଶୀତଳତା ର ଲୀଳା ଚନ୍ଦନ ଲାଗି ଓ ଚନ୍ଦନ ଯାତ୍ରା ର ଅୟମାରମ୍ଭ କରିଥାନ୍ତି। ବୈଶାଖ ମାସ ରେ ବିଷ୍ଣୁ ଙ୍କୁ ମଧୁସୂଦନ ନାମରେ ପୂଜା କରାଯାଏ। ଏହି ମାସ ରେ ଚନ୍ଦନ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କର ଅତିପ୍ରିୟ ହୋଇଥାଏ। ଏହି ଚନ୍ଦନଲାଗି ନିମନ୍ତେ ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ପୂର୍ବରୁ ପ୍ରସ୍ତୁତି ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଇଥାଏ।ବିଭିନ୍ନ ମଠ ଓ ପ୍ରଶାସନ ଯୋଗାଇ ଦେଇଥିବା ସାମଗ୍ରୀ , ଯଥା - ଚନ୍ଦନ କାଠ , କର୍ପୁର , କେଶର , ଜାଇଫଳ ଓ ଚୁଆ ଇତ୍ୟାଦି ସୁଗନ୍ଧିତ ଦ୍ରବ୍ୟ ର ଲେପ ମିଶ୍ରଣ ଚନ୍ଦନ ଘରେ ଘଟୁଆରୀ ମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଥାଏ।ଏହି ଚନ୍ଦନ ବୈଶାଖ ଶୁକ୍ଳ ଦ୍ଵିତୀୟା ଦିନ ସନ୍ଧ୍ୟା ସୁଦ୍ଧା ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇସାରିଥାଏ। ଦ୍ଵିତୀୟା ଦିନ ସନ୍ଧ୍ୟାଧୂପ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବାପରେ ଭୋଗମଣ୍ଡପ ଘର ଧୋ ପଖାଳ ହୋଇ ଚନ୍ଦନ ରଖାଯାଇ ପୂଜାପଣ୍ଡା ଙ୍କ ଦ୍ଵାରା ଅଧିବାସିତ ହୋଇଥାଏ। ଏହାପରେ ଦୈନିକ ରୀତି ରେ ଚନ୍ଦନଲାଗି, ବଡ଼ସିଂହାର ଓ ପହୁଡ଼ ଆଦି ଯଥା ରୀତି ସମ୍ପାଦିତ ହୋଇଥାଏ । ସୂଚନାଯୋଗ୍ୟ ଯେ, ଯେପରି ଜଣେ ସାଧାରଣ ମନୁଷ୍ୟ ର ମନରେ କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟ ଆଦି ର ପୂର୍ବ ରାତ୍ର ରେ ମନରେ ଉତ୍ସାହ ବା ଚଞ୍ଚଳତା କାରଣରୁ ସଠିକ ଭାବେ ନିଦ ହୁଏ ନାହିଁ , ପ୍ରାତଃ କାଳ ର ଅପେକ୍ଷା ଥାଏ। ଠିକ ସେହିପରି ମହାପ୍ରଭୁ ଙ୍କର କୌଣସି ଦିନ ଅଧିବାସ ହୋଇଥିଲେ , ଅନୁଷ୍ଠିତ ହେବାକୁ ଥିବା ଉତ୍ସବ ନିମିତ୍ତ ମହାପ୍ରଭୁ ଙ୍କୁ ସଠିକ ଭାବେ ନିଦ ହୁଏନାହିଁ। ଏହିକାରଣରୁ ଅଧିବାସ ହୋଇଥିବା ଦିନ ପହୁଡ଼ ସମୟରେ ଶୟନ ଠାକୁର ଭିତରକୁ କିମ୍ବା ଡମ୍ବରୁ ଉପରକୁ ବିଜେ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।

ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ଦିନ ଦ୍ୱାରଫିଟା ଠୁ ଆରମ୍ଭ କରି ଆଳତି , ଅବକାଶ , ବଲ୍ଲଭ ଓ ସକାଳ ଧୂପ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇସାରିବା ପରେ ଭିତରେ ମଇଲମ ହୋଇ ଯାତ୍ରାଙ୍ଗି ମହାସ୍ନାନ ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥାଏ।ଏହାପରେ ବିନା ଉତ୍ତରୀୟ(ଶିର କପଡା) ଓ ପହରଣା ରେ ନୂଆଲୁଗା ଲାଗି ହୋଇଥାଏ ଏବଂ ଛ ମୂର୍ତ୍ତି ଅଳଙ୍କାର ଲାଗି ହୋଇ ଭିତରେ ପାଣି ପଡିଥାଏ।ଏହି ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ନୀତି ସରିବା ପରେ ଭୋଗମଣ୍ଡପ ଘର ମୁଦ ଫିଟି ପୂଜାପଣ୍ଡା ,ପତିମହାପାତ୍ର , ମୁଦିରସ୍ତ ଓ ତିନିଜଣ ପାଳିଆ ପୁଷ୍ପାଳକ ମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଚନ୍ଦନ ବେଢା ହୋଇଥାଏ। ଏହାପରେ ଚନ୍ଦନ ପିଙ୍ଗଣ ମାନ ଭିତର ସିଂହାସନ ଉପରେ ରଖାଯାଏ। ଏହିପରି ଅବସ୍ଥା ରେ ଏକ ଖାଇକୋରା ଭୋଗ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥାଏ। ଏହାପରେ ପଣ୍ଡା ପତି ମୁଦିରଥ, ତିନିଜଣ ପାଳିଆ ପୁଷ୍ପାଳକ ଓ ତିନିଜଣ ମେକାପ ସିଂହାସନ ଉପରକୁ ଉଠିଥାନ୍ତି। ମେକାପ ମନେ ଶ୍ରୀଅଙ୍ଗ ସ୍ପର୍ଶ ନ କରି ପଣ୍ଡା ପତି ମୁଦିରଥ ଓ ତିନିଜଣ ପାଳିଆ ପୁଷ୍ପାଳକ ମାନଙ୍କ ହାତକୁ ଚନ୍ଦନ ବଢ଼ାଇ ଥାନ୍ତି ଓ ମହାପ୍ରଭୁ ଙ୍କ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଶ୍ରୀଅଙ୍ଗ ଓ ପେଟ ର ଅର୍ଧେକ ଏହି ସୁଗନ୍ଧିତ ଦ୍ରବ୍ୟ ମିଶ୍ରିତ ଚନ୍ଦନ ଲେପନ କରାଯାଏ। ଚନ୍ଦନଲାଗି ପରେ ଚନ୍ଦନଲାଗି ସମୟରେ ଲାଗୁଥିବା ପୁଷ୍ପ ନିର୍ମିତ ଚୁଳ, ଅଳକା , ଶ୍ରୀମସ୍ତକ ରୁ ଶ୍ରୀପୟର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଲମ୍ବିଥିବା ଚଉସରି ମାଳ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଦୈନନ୍ଦିନ ବ୍ୟବହୃତ ପୁଷ୍ପ ଅଳଂକାର ମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଓ ପରିଶେଷ ରେ କର୍ପୁରଲାଗି ହୋଇ ବେଶ ବଢିଥାଏ। ଏହାପରେ ମଧ୍ୟାହ୍ନଧୂପ ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୁଏ। ମଧ୍ୟାହ୍ନଧୂପ ବଢିବା ପରେ ପଣ୍ଡା ପତି ମୁଦିରଥ ମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦ୍ଵାଦଶ ଯାତ୍ରା ବନ୍ଦାପନା ହୋଇଥାଏ। ଏହାପରେ ପାଣି ପଡି ଯାତ ଭୋଗ ନିମନ୍ତେ ପୂଜା ଠା ହୋଇ ଭୋଗ ଡାକି ଯାଇଥାଏ।ତତ୍ପରେ ଶ୍ରୀମଦନମୋହନ ଓ ରାମକୃଷ୍ଣ ଭିତର ସିଂହାସନରେ ଯଥାକ୍ରମେ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ବାଡେ ଓ ବଡବାଡେ ବିଜେ କରିଥାନ୍ତି।ଏହାପରେ ଯାତଭୋଗ ପଞ୍ଚୋପଚାର ବିଧିରେ ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥାଏ।ଭୋଗ ସରିବା ପରେ ଆଜ୍ଞାମାଳ ପ୍ରଦାନ କରାଯାଏ। ବଡବାଡ଼ ରୁ ରାମକୃଷ୍ଣ ଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ରାମ ଙ୍କୁ ଓ ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ବାଡ଼ ରୁ ଶ୍ରୀ ମଦନମୋହନାଦି ଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞାମାଳ ପ୍ରଦାନ କରାଯାଇଥାଏ।ଏହାପରେ ଦିଅଁ ମୁକ୍ତିମଣ୍ଡପ ନିକଟରେ ଥିବା ବିମାନ ଓ ପାଲିଙ୍କି ରେ ବିଜେ କରନ୍ତି। ବିମାନରେ ଦିଅଁ ରୁନ୍ଧା ହେବା ପରେ ମାଳଫୁଲ ଲାଗି ହୋଇ ବେଶ ହୋଇଥାନ୍ତି।ଏହାପରେ ଘଣ୍ଟ,ଶୁକ୍ଳ ଓ କୃଷ୍ନ ଛତା,ତ୍ରାଶ, ଓଲାର,କାହାଳୀ ଓ ବୈଜୟନ୍ତ୍ରୀ ପଟୁଆର ରେ ବିମାନ ଓ ପାଲିଙ୍କି ବିମାନବଡୁ ମାନଙ୍କ ସ୍କନ୍ଧଆରୋହଣ କରି ପଟୁଆର ନରେନ୍ଦ୍ର ସରୋବର ଅଭିମୁଖେ ଯାତ୍ରା କରିଥାନ୍ତି।ଏହି ମାର୍ଗ ରେ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ଭିତରେ , ବାହାରେ, ନରେନ୍ଦ୍ର ସରୋବର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବିଭିନ୍ନ ବ୍ୟକ୍ତି ବିଶେଷ, ଅନେକ ମଠ, ଶ୍ରୀ ନହର ଆଦି ରେ ପନ୍ତି ର ବ୍ୟବସ୍ଥା ରହିଥାଏ।ସିଂହଦ୍ୱାର ନିକଟରେ ପଞ୍ଚ ମହାଦେଵ ଏହି ପଟୁଆର ରେ ସାମିଲ ହୁଅନ୍ତି ।

ଭକ୍ତ ମାନଙ୍କ ଗହଣରେ ଦଶାବତାର , ମଙ୍ଗଳଗୀତ, ମଣି ବିମାନେ ଗୋବିନ୍ଦ……….. , ଦେଖଗୋ ଆଗୋ ସଖି ଦେଖଗୋ……. ଆଦି ସଂଗୀତ ଓ କୀର୍ତ୍ତନ , ହରିବୋଲ ହୁଳହୁଳି ରେ ପ୍ରକମ୍ପିତ ହୋଇ ପଟୁଆର କୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭାବ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ବଡ଼ଦାଣ୍ଡ କୁ ଆନନ୍ଦ ଉଲ୍ଲାସରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ କରିଥାଏ।ଉକ୍ତ ଦିନ ଚନ୍ଦନଯାତ୍ରା ର ପ୍ରଥମ ଦିବସ ହୋଇଥିବା ଯୋଗୁଁ ପଟୁଆର ରେ ଅନେକ କୀର୍ତ୍ତନୀୟା ଦଳ , ନାଗା, ମେଢ ତଥା ବିଭିନ୍ନ ଖେଳ ପ୍ରଦର୍ଶନ ଓ ଅନେକ ଶୋଭନୀୟ ଦୃଶ୍ୟ ସାମିଲ ହୋଇଥାଏ।ଏହିଦିନ ରଥ ନିର୍ମାଣ କାର୍ଯ୍ୟ ଅନୁକୁଳ ଥିବାରୁ ଏହି ପଟୁଆର ସାଙ୍ଗରେ ତିନିଜଣ ପାଳିଆ ପୂଜାପଣ୍ଡା ମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ତିନିବାଡରୁ ତିନିଖଣ୍ଡ ଆଜ୍ଞାମାଳ ନିର୍ମାଣ ଅନୁକୂଳ ନିମିତ୍ତ ଆସିଥାଏ। ପଟୁଆର ରଥଖଳା ପାଖରେ ପହଞ୍ଚିବା ପରେ ଯେଉଁ ସ୍ଥାନ ରେ ଅନୁକୁଳ କରାଯାଏ (ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର କାର୍ଯ୍ୟାଳୟ ସମ୍ମୁଖରେ) ସେହି ସ୍ଥାନ କୁ ବିମାନ ର ମୁଖ ହୋଇଥାଏ ।ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କ ଚଳନ୍ତି ପ୍ରତିମା ମାଧ୍ୟମରେ ପ୍ରଭୁ ନିଜେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ ଅନୁକୁଳ କାର୍ଯ୍ୟ ସମ୍ପାଦନ କରାଇଥାନ୍ତି। ଓ ପରେ ପଟୁଆର ନରେନ୍ଦ୍ର ଅଭିମୁଖେ ଯାତ୍ରା କରେ। ଚନ୍ଦନ ଚକଡ଼ା ଠାରେ ପହଂଚିବା ପରେ ପଥ ଶ୍ରମ କାରଣରୁ ମହାପ୍ରଭୁ ଙ୍କୁ କାଳେ ତୃଷ୍ଣା ହେଉଥିବ କି, ଏହି ଭାବ ନେଇ ଭିତରଚ୍ଛ ମହାପାତ୍ର ଙ୍କ ଦ୍ଵାରା ଘସା ଜଳ ଅର୍ପଣ ବା ଜଳଲାଗି ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇଥାଏ। ଏହାପରେ ମଦନମୋହନ , ଭୂଦେବୀ ଓ ଶ୍ରୀଦେବୀ ଶୁକ୍ଳ(ନନ୍ଦା) ଚାପ ରେ ଓ ରାମକୃଷ୍ଣ , ପଞ୍ଚ ମହାଦେବ ରକ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣ (ଭଦ୍ରା)ଚାପ ରେ ବିଜେ କରନ୍ତି।ଶୁକ୍ଳ ବର୍ଣ୍ଣ ଚାପଟି ସାନ ଓ ରକ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣ ଚାପ ଟି ବଡ଼ ଚାପ ଅଟେ। ଏଥିମଧ୍ଯରୁ ଶୁକ୍ଳ ଚାପ ରେ ଗୋଟିଏ ସିଂହାସନ ଥାଏ ଓ ଏହିଥିରେ ମଦନମୋହନ ଓ ଭୂଦେବୀ ଶ୍ରୀଦେବୀ ବିଜେ କରନ୍ତି। ବଡ଼ ଚାପ ରେ ଆଗ ପଛ ହୋଇ ଦୁଇଟି ସିଂହାସନ ମଧ୍ୟରୁ ଅଗ ଟିରେ ଶ୍ରୀରାମକୃଷ୍ଣ ଓ ପଛଟିରେ ପଞ୍ଚ ମହାଦେବ ବିଜେ କରିଥାନ୍ତି।ଦୁଇଟି ଡଙ୍ଗା ଉପରେ ଗୋଟିଏ ପୀଠ କରି ସମ୍ମୁଖ ଭାଗରେ ଉନ୍ମୁକ୍ତ ପକ୍ଷ ଯୁକ୍ତ ହଂସ ସଂଯୋଗ କରି ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ଗୋଟିଏ ଚାପ ନିର୍ମାଣ କରାଯାଇଥାଏ।ବଡ଼ ଚାପ ଟି ପ୍ରଥମ ଓ ପରେ ସାନ ଚାପ ଟି ବିଜେ କରିଥାଏ ।ଏହା ପୂର୍ବରୁ ଏକ ଡଙ୍ଗା ରେ ବୈଜୟନ୍ତ୍ରୀ ଯାଇଥାଏ।ଏହା ଚାପ ଆରମ୍ଭ ରୁ ଶେଷ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆଗେ ଆଗେ ଚାଲିଥାଏ।ଦିଅଁ ଚାପ ରେ ବିଜେ ହେବାପରେ ଚାପ ମଧ୍ୟରେ ଘଣ୍ଟ ,ଛତା , କାହାଳୀ, ଚାମର ଆଦି ଦ୍ୱାରା ସୋଭିତ ହୋଇ ସେବାପ୍ରିୟ ସେବା ମାନ ଗ୍ରହଣ କରି ଆନନ୍ଦ ଉଲ୍ଲାସର ସହ ନାବକେଳି କରନ୍ତି। ଚାପ ଚାଲୁଥିବା ସମୟରେ ହଡ଼ପନାଏକ ବିଡ଼ିଆ ମଣୋହି କରୁଥାନ୍ତି।ଦିନଚାପ ଶେଷ ହେବାପରେ ଦିଅଁ ଚାପରେ ମଇଲମ ହୋଇ ଭିତର ଚକଡ଼ା କୁ ବିଜେ କରନ୍ତି।ଏହାକୁ ଦିନଚାପ କୁହାଯାଏ।ଏହାପରେ ଶ୍ରୀରାମକୃଷ୍ଣ , ପଞ୍ଚ ମହାଦେବ ଓ ମଦନମୋହନ ଆଦି ପୃଥକ ପୃଥକ ଗୃହ କୁ ବିଜେ କରନ୍ତି।ମଧ୍ୟ ଭାଗରେ ଥିବା ବଡ଼ ଗୃହଟିରେ ଶ୍ରୀମଦନମୋହନ ଭୂଦେବୀ ଶ୍ରୀଦେବୀ ବିଜେ କରନ୍ତି। ଗୃହ ର ବାମ ପାର୍ଶ୍ୱ ରେ ଥିବା ଏକ କ୍ଷୁଦ୍ର ଗୃହ କୁ ଶ୍ରୀରାମକୃଷ୍ଣ ବିଜେ କରନ୍ତି ଏବଂ ଦକ୍ଷିଣ ପଟେ ଥିବା ଅନ୍ୟ ଏକ ଗୃହ କୁ ପଞ୍ଚ ମହାଦେବ ବିଜେ କରନ୍ତି।ପୃଥକ ପୃଥକ ଗୃହ ରେ ବିଜେ କରିବା ପରେ ଲୁଗା ମଇଲମ ହୋଇ କ୍ଷୁଦ୍ର ବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ ପୂର୍ବକ ଦିଅଁ ମାନେ ଚନ୍ଦନ କର୍ପୁର ଜାଇଫଳ ଆଦି ଶୀତଳ ପଦାର୍ଥ ମିଶ୍ରିତ ସୁଗନ୍ଧିତ ପୁଷ୍ପ ଯୁକ୍ତ ଜଳ କୁଣ୍ଡ ମଧ୍ୟରେ ଜଳକ୍ରୀଡ଼ା ନିମିତ୍ତ ବିଜେ କରିଥାନ୍ତି।କିଛି ସମୟ କୁଣ୍ଡ ରେ ଅବସ୍ଥାନ କରିବାପରେ ଶ୍ରୀରାମକୃଷ୍ଣ ମଦନମୋହନାଦି ଥିବା ଗୃହ କୁ ବିଜେ କରନ୍ତି। ଏହାପରେ ସେହି ଗୃହ ରେ ଥିବା ସମସ୍ତ ବିଗ୍ରହ ଜଳ ରୁ ଉଠି ବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ କରି ଶୀତଳଭୋଗ ଅର୍ପିତ ହୋଇଥାନ୍ତି।ଏହାପରେ ବାହାର ମଣ୍ଡପକୁ ମଦନମୋହନାଦି ବିଜେ ହୋଇ ସେଠାରେ ବେଶ ହୋଇଥାନ୍ତି। ପଞ୍ଚମହାଦେଵ ଜଳରୁ ଉଠି ସେହି ଗୃହ ମଧ୍ୟରେ ବେଶ ହୋଇଥାନ୍ତି। ସେଠାରେ ବେଶ ବଢିବା ଶୁଦ୍ଧା ସେହିଠାରେ ଥିବା ରୋଷ ଘରେ ମହାସୁଆର ଙ୍କ ଦ୍ଵାରା ମାଣ୍ଡୁଅ ତଥା ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଭୋଗ ପ୍ରସ୍ତୁତ କରାଯାଇଥାଏ।ବେଶ ବଢିବା ପରେ ଦିଅଁ ଭିତରକୁ ବିଜେ କରନ୍ତି। ଭିତରେ ପୂଜାପଣ୍ଡା ପଞ୍ଚୋପଚାର ବିଧିରେ ଭୋଗ ସାରିଥାନ୍ତି ।ପଞ୍ଚମହାଦେଵ ଙ୍କ ନିକଟରେ ସେମାନଙ୍କ ପାଳିଆ ମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସର୍ପାମଣୋହି ରେ ଭୋଗ ହୋଇଥାଏ। ଭିତରେ ଭୋଗ ସରିବାପରେ ମଦନମୋହନାଦି ବାହାର ମଣ୍ଡପକୁ ବିଜେ କରନ୍ତି। ସେଠାରେ ହଡପନାଏକ ବିଡ଼ିଆ ମଣୋହି କରିଥାନ୍ତି । ଏ ଉତ୍ତାରୁ ଦିଅଁ ରାତିଚାପ କୁ ବିଜେ କରନ୍ତି।ରାତିଚାପ ପୂର୍ବବତ୍ ହୋଇଥାଏ । କେବଳ ରାତିଚାପରେ ଚନ୍ଦ୍ରଉଦିଆ ଆଦି ଆଲୋକମୟ ବାଣ ମାନ ଫୁଟାଯାଏ। ବେଳେ ବେଳେ ଚାପ ସମୟରେ ଚାପ ବାହାରେ କୁଳ ରେ ପାହାଚ ଉପରେ ଅନେକ ଆତଶବାଜି ମଧ୍ୟ ଫୁଟିଥାଏ।ଏହାପରେ ରାତିଚାପ ସାରି ଦିଅଁ ଜେଯାହା ବିମାନ ତଥା ପାଲିଙ୍କି କୁ ବିଜେ କରନ୍ତି ଓ କେବଳ ଘଣ୍ଟ ଛତା ପଟୁଆର ରେ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର କୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କରନ୍ତି ।ପଞ୍ଚମହାଦେଵ ମଧ୍ୟ ନିଜ ନିଜ ମନ୍ଦିର କୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କରନ୍ତି।ବିମାନ ପୂଜାପଣ୍ଡା ନିଯୋଗ ସମ୍ମୁଖରେ ରଖାଯାଏ। ଭୂଦେବୀ ଶ୍ରୀଦେବୀ କୌଣସି ନୀତି ନହେଉଥିବା ସମୟରେ ଭିତରୁ ବିଜେ କରନ୍ତି ଓ ମଦନମୋହନ ,ରାମକୃଷ୍ଣ ଦକ୍ଷିଣ ଘର କୁ ବିଜେ ହୋଇ ସେଠାରେ ମଇଲମ ହୋଇଥାନ୍ତି ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ନୀତି ବଢିଥାଏ।ଏପଟେ ଭିତରେ ଦିଅଁ ଚାପ କୁ ବିଜେ କରିବା ପରେ ପାଣିପଡି ମଇଲମ ହୋଇ ସନ୍ଧ୍ୟାଆଳତି ବେଶ ହୋଇଥାନ୍ତି। ଏହି ବେଶ ରେ ମହାପ୍ରଭୁ ଚନ୍ଦନଲାଗି ଚାଲିଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଶୁକ୍ଳ ସୂତା ଲୁଗା ପରିଧାନ କରନ୍ତି । ବେଶ ବଢି ସନ୍ଧ୍ୟା ଆଳତୀ ଓ ସନ୍ଧ୍ୟାଧୂପ ସରିବା ପରେ ଜୟବିଜୟ ଦ୍ୱାର ବନ୍ଦ କରାଯାଇ ସମଗ୍ର ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର କୁ ଅନ୍ଧାର କରାଯାଇଥାଏ। ଏହାପରେ ପାଳିଆ ପୁଷ୍ପାଳକ ମଇଲମ କୁ ଯାଇଥାନ୍ତି। ମଇଲମ ହୋଇ ଦିଅଁ ଏକ ବିଶେଷ ଲୁଗା ପରିଧାନ କରନ୍ତି ଯାହାର ନାମ ମାଧାବଳି। ଏହି ଲୁଗା ପରିଧାନ ପରେ ଭିତରୁ ଅଖଣ୍ଡ ଦୀପ ଲିଭିଥାଏ ଓ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଅନ୍ଧକାର ମଧ୍ୟରେ ମହାପ୍ରଭୁ ଙ୍କର ଆଲଟ ଲାଗି (ପଙ୍ଖା) ସେବା ସମାପିତ ହୋଇଥାଏ।ଆଲଟ ଲାଗି ସରିବାପରେ ତିନିବାଡ ର ପାଳିଆ ପୂଜାପଣ୍ଡା ଦିଅଁ ବିନା ମାଳ ଫୁଲ ଓ ଏକବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ କରିଥିବା ସମୟରେ , ବିନା ଘଣ୍ଟି ରେ ପଣାଭୋଗ କରିଥାନ୍ତି।ପଣା ଭୋଗ ସରିବା ପରେ ଦ୍ୱାର ଫିଟି ପୁନଶ୍ଚ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ଅଲୋକମୟ ହୋଇଥାଏ। ଏହାପରେ ଚନ୍ଦନଲାଗି ହୋଇଥାଏ। ପ୍ରକାଶ ଥାଉ କି ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ଠାରୁ ଚନ୍ଦନଲାଗି ନୀତି ସରିବା ଦିନ ଯାଏ ଦିଅଁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍ତାପ ହେତୁ ପାଟବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ କରନ୍ତି ନାହିଁ।କେବଳ ପତନୀ ଓ ସୂତା ଶୁକ୍ଳଲୁଗା ପରିଧାନ କରନ୍ତି। କେବଳ ସକାଳଧୂପ ବେଶ ରେ ଖଣ୍ଡିଏ ଖଣ୍ଡିଏ ପାଟ କେବଳ ଶିରକପଡା(ଉତ୍ତରୀୟ) ହେଉଥିଲେ ହେଁ ପତନୀ ପରିଧାନ କରିଥାନ୍ତି।ଏପରିକି ବଡ଼ସିଂହାର ସମୟରେ ପରିଧାନ କରୁଥିବା ଗୀତଗୋବିନ୍ଦ ଲିଖିତ ଖଣ୍ଡୁଆ ଓ ଶ୍ରୀଭୁଜ ଓ ଅଧର ରେ ଲାଗିହେଉଥିବା ଫୁଟା ନାମକ ବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ କରନ୍ତି ନାହିଁ।ବଡ଼ସିଂହାର ବେଶ ରେ ପତନୀ ପରିଧାନ କରନ୍ତି ଓ ପହରଣା ଲାଗିହୁଏ।ଶିରକପଡା ବୋଇରାଣୀ ହୋଇଥାଏ।ବଡ଼ସିଂହାର ବେଶ ବଢିବା ପରେ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ନୀତି ହୋଇ ପହୁଡ଼ ହୋଇଥାଏ ।

ପ୍ରକୃତ ପକ୍ଷେ ମହାପ୍ରଭୁ ଲୀଳାମୟ ଙ୍କ ଲୀଳା ଅତି ବିଚିତ୍ରମୟ ଓ ମାନବୀୟ ଭାବପୂର୍ଣ୍ଣ ଅଟେ।ଏହି କାରଣରୁ କବି ଗାଇଉଠିଥିଲେ
“ଜଗବନ୍ଧୁ ପରି ଜଣେ ସାମନ୍ତ ……
ନାହିଁ ନାହିଁ ତ…..”

ଜୟ ଜଗନ୍ନାଥ।

ଅକ୍ଷୟ_ତୃତୀୟା

ଅକ୍ଷିମୁଠି ଅନୁକୂଳ, #ମହାପ୍ରଭୁଙ୍କଚନ୍ଦନଯାତ୍ରାଆରମ୍ଭ

ବୈଶାଖ ଶୁକ୍ଳ ତୃତୀୟା ଦିନଟି ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ଭାବେ ପରିଚିତ । ଏହି ଦିନକୁ ଔପଚାରିକ ଭାବେ ସରକାରୀ ସ୍ତରରେ କୃଷକ ଦିବସ ରୂପେ ପାଳନ କରାଯାଏ । କୃଷକମାନେ ଏହାକୁ ବଡ଼ ଶୁଦ୍ଧି ଓ ସିଦ୍ଧିର ଦିବସ ଭାବେ ପାଳନ କରିଥାନ୍ତି । କୃଷକ ଏହିଦିନ ଅମୃତ ବେଳାରେ ଅକ୍ଷିମୁଠି (ଅକ୍ଷୟମୁଠି) ଅନୁକୂଳ କରି କୃଷିକାର୍ଯ୍ୟର ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିଥାଏ । ଶୁଭଦିନ ଭାବେ ମନେକରି ଏହିଦିନ ଗୃହନିର୍ମାଣ, ନିର୍ବନ୍ଧ, ବିବାହ, ଉପନୟନ ପ୍ରଭୃତି ଶୁଭକର୍ମ ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୁଏ । ଚାଷୀ ନିଜ ସ୍ତ୍ରୀଠାରୁ ହଳଦୀ, ଚନ୍ଦନ, ସିନ୍ଦୂର ବୋଳା ଧାନ ବିହନପୂର୍ଣ୍ଣ ନୂଆ ଗଉଣିକୁ ଶଙ୍ଖ ହୁଳହୁଳି ମଧ୍ୟରେ ମୁଣ୍ଡରେ ଥୋଇ ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଏକ ନୂତନ ଟୋକେଇରେ ପିଠା ନେଇ ହଳଲଙ୍ଗଳ ଧରି କ୍ଷେତକୁ ଯାଏ । ସେଠାରେ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ଠାକୁରାଣୀଙ୍କୁ ଭୋଗଦେଇ ଉକ୍ତ ନୈବେଦ୍ୟ କିଆରୀର ଈଶାଣ କୋଣରେ ପୋତି ହଳ ବୁଲାଏ ଓ ମୁଠାମୁଠା ବିହନ କିଆରୀରେ ବୁଣେ । ଏହାକୁ ଅକ୍ଷିମୁଠି କହନ୍ତି । ସଧବା ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ଏ ଦିନ ‘ଷଠିଦେବୀ’ଙ୍କ ପୂଜା କରନ୍ତି । jayjagannathgroup.com

ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟା ବ୍ରତ

ବୈଶାଖ ମାସ ଶୁକ୍ଳପକ୍ଷ ତୃତୀୟା ସହିତ କୃତ୍ତିକା ବା ରୋହିଣୀ ନକ୍ଷତ୍ରଯୁକ୍ତ ହେଲେ ମହାଫଳ ପ୍ରାପ୍ତିହୁଏ । ଏହାକୁ ବ୍ରତ ରୂପେ ପାଳନ କରାଯାଏ । ବ୍ରତୀମାନେ ଶୁଦ୍ଧକାଳରେ ଏହି ବ୍ରତକୁ ଆରମ୍ଭକରି ଆଠବର୍ଷରେ ଉଦ୍‌ଯାପନ କରନ୍ତି । ଏହିଦିନ ଜଳଦାନ କଲେ କି ପୁଣ୍ୟଫଳ ମିଳେ ସେ ସଂପର୍କରେ ଚମତ୍କାର ଉପାଖ୍ୟାନଟି ଏହିପରି- ପୁରାକାଳରେ ଜଣେ ପାପୀ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଥିଲା । ସେ ତା’ ଜୀବନରେ କିଛି ଦାନ ଧର୍ମକାର୍ଯ୍ୟ କରି ନଥିଲା । ଥରେ ତା’ ଗୃହକୁ ଅନ୍ୟ ଜଣେ ତୃଷାର୍ତ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଆସି ଜଳଭିକ୍ଷା କଲା । ପାପୀ ବ୍ରାହ୍ମଣ ତାକୁ ଜଳ ନଦେଇ ନିଷ୍ଠୁର ଭାବେ ଗୃହରୁ ବିତାଡିତ କଲା ସମୟରେ ସୁଶିଳା ନାମ୍ନୀ ତା’ର ସ୍ତ୍ରୀ ଆସି ସ୍ୱାମୀକୁ ସେ କାର୍ଯ୍ୟରୁ ନିବୃତ୍ତ କଲା ଓ ତୃଷାର୍ତ୍ତକୁ ଜଳଦାନ କଲା । କିଛି ବର୍ଷ ପରେ ପାପୀ ବ୍ରାହ୍ମଣର ମୃତ୍ୟୁ ହେଲା । ଯମଦୂତମାନେ ଆସି ତାକୁ ବାନ୍ଧି ନେଇଗଲେ । ଯମପୁରୀରେ ଥାଇ ଥରେ ସେ ତୃଷାର୍ତ୍ତ ହୋଇ ଯମଦୂତଙ୍କୁ ଜଳଭିକ୍ଷା କଲା । ଯମଦୂତମାନେ ତାହାକୁ ତିରଷ୍କାର କରି କହିଲେ- ନିଜ ଜୀବନରେ କେବେ ଜଳଦାନ ନକରି ଜଳଭିକ୍ଷା କରୁଛୁ କିପରି, ପାପୀ ? ଏହି ସମୟରେ ସ୍ୱୟଂ ଯମରାଜ ସେଠାରେ ପହଞ୍ଚି ସ୍ୱହସ୍ତରେ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ ଜଳଦାନ କଲେ । ଦୂତମାନେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ହୋଇ ଏହାର କାରଣ ପଚାରିବାରୁ ଯମରାଜ କହିଲେ – ଏହି ବ୍ରାହ୍ମଣ ସାରା ଜୀବନ ପାପକର୍ମ କରିଥିଲେ ସୁଦ୍ଧା ଅକ୍ଷୟତୃତୀୟା ଦିନ ଏହାର ସ୍ତ୍ରୀ ତୃଷାର୍ତ୍ତ ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ ଜଳଦାନ କରିଥିଲା । ସ୍ତ୍ରୀର ସେହି ପୁଣ୍ୟବଳରୁ ଏହାର ପାପ ଖଣ୍ଡନ ହୋଇଛି । ତେଣୁ ଏହାର ଆଉ ନର୍କଭୋଗ ଯୋଗ ନାହିଁ । ମହର୍ଷି ଜନକ ଭାରତୀୟ କୃଷିଜୀବୀ କୁଳର ପ୍ରତିନିଧି ରୂପେ ନିଜେ ଭୂମିପୂଜା କରି ବୀଜବପନ କରୁଥିଲେ । ଭୂମିକର୍ଷଣ ସମୟରେ ସେ ସୀତାଙ୍କୁ ଲାଭ କରିଥିବାରୁ ଋକ୍ ବେଦରେ ସୀତା ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ବୀଜଦାତ୍ରୀ ରୂପେ ବର୍ଣ୍ଣିତ ହୋଇଛନ୍ତି । ବୈଦିକ ଋଷିମାନେ ଅକ୍ଷୟ ଶସ୍ୟ ପ୍ରଦାନ କରିବା କାମନାରେ ସୀତାଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରିଛନ୍ତି । ଆଗ୍ନେୟ ପୁରାଣ, ବିଷ୍ଣୁ ଧର୍ମୋତ୍ତର ପୁରାଣ ଓ ଭବିଷ୍ୟ ପୁରାଣାଦିରେ ଅକ୍ଷୟ ତୃତୀୟାକୁ ଗୋଟିଏ ପ୍ରଶସ୍ତ ଶୁଭଦିନ ରୂପେ ବର୍ଣ୍ଣନା କରାଯାଉଛି ।

ରଥନିର୍ମାଣର ଶୁଭାନୁକୂଳ

ଏହିତିଥିରେ ଶ୍ରୀଜୀଉମାନଙ୍କର ରଥନିର୍ମାଣ ପାଇଁ ଅନୁକୂଳ କରାଯାଏ । ତନ୍ତ୍ରବିଧି ଅନୁସାରେ ମହାକାଳୀ ମନ୍ତ୍ରରେ ପୂଜିତ କୁରାଢି ଲଗାଇ ବନଯୋଗହୋମର ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ତଥା ଦେଉଳ ପୁରୋହିତ ରଥନିର୍ମାଣର ଶୁଭାରମ୍ଭ କରିଥାନ୍ତି । ତାଳଧ୍ୱଜ, ଦେବଦଳନ ଓ ନନ୍ଦିଘୋଷ ରଥ ପାଇଁ ଉଦ୍ଦିଷ୍ଟ ଗୋଟିଏ ଧଉରା କାଠ ଗଣ୍ଡିରେ କୁରାଢି ସ୍ପର୍ଶ କରାଯାଇଥାଏ । ଶ୍ରୀମନ୍ଦିରରେ ମଧ୍ୟାହ୍ନ ଧୂପରେ ଶ୍ରୀଜୀଉଙ୍କ ଆଜ୍ଞାମାଳ ଚନ୍ଦନଠାକୁରଙ୍କ ସହ ପଟୁଆରରେ ରଥଖଳାକୁ ଆସିଥାଏ । ଏହାକୁ ତିନିଜଣ ପୂଜାପଣ୍ଡା ଆଣିଥାନ୍ତି । ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥ ମନ୍ଦିର ସମ୍ମୁଖସ୍ଥ ରଥଖଳାରେ ଶ୍ରୀମନ୍ଦିର ପୁରୋହିତ, ରାଜଗୁରୁ ଓ ସ୍ତ୍ରୋତୀୟ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନେ ବନଯୋଗ ପୂଜା ସମ୍ପାଦନା କରିବାର ବିଧି ରହିଛି । ରୂପକାର, କମାର, ଚିତ୍ରକର, ଭୋଇ, ଅମୀନସେବକମାନଙ୍କ ଉପସ୍ଥିତିରେ ବିଶ୍ୱକର୍ମାଙ୍କ ଶାଢୀବନ୍ଧା ନୀତି ପାଳିତ ହୁଏ । ରଥ ସଂହିତା ଓ ଶିଳ୍ପଶାସ୍ତ୍ର ଅବଲମ୍ବନରେ ରଥନିର୍ମାଣ କରାଯାଏ । ଏଥିରେ ୧୧୩୯ ଖଣ୍ଡ କାଠଲାଗିଥାଏ । ସେହି କାଠଗୁଡିକ ହେଲା ଫାସି, ଅସନ, ଧଉରା, ଶିମିଳି, ପାଳଧୂଆ, ମହାନିମ୍ବ, ଗମ୍ଭାରୀ, ମଇ, କଦମ୍ବ, ଦେବଦାରୁ ଇତ୍ୟାଦି । ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥ ମନ୍ଦିର ପ୍ରଶାସନର କର୍ମଚାରୀ ରଥଖଳାରେ ଉପସ୍ଥିତ ରହି ଏହିକାର୍ଯ୍ୟ ସୁରୁଖୁରରେ ହେବାରେ ସାହାଯ୍ୟ କରିଥାନ୍ତି । ବାହାର ଚନ୍ଦନ ଯାତ୍ରାର ଶେଷଦିନ ରଥ ଅଖରେ ଚକ ଲାଗେ ।

ଏହି ଦିନର ବିଶେଷତ୍ୱ

✔ମହାପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କର ରଥଯାତ୍ରା ପାଇଁ ଉଦ୍ଧିଷ୍ଟ ରଥ ନିର୍ମାଣ ଆରମ୍ଭ

✔ମହାପ୍ରଭୁ ଶ୍ରୀଜଗନ୍ନାଥଙ୍କର ଚନ୍ଦନଯାତ୍ରାର ଶୁଭାରମ୍ଭ ଏହି ଦିନ ହୋଇଥାଏ

✔ବଳଦେବଜୀଉ ମନ୍ଦିରରେ କୃଷିର ଆରାଧ୍ୟ ଦେବ ହଳାୟୁଧ ବଳରାମଙ୍କର ରେବତୀଙ୍କ ସହ ବିବାହୋତ୍ସବ ଅନୁଷ୍ଠିତ ହୋଇଥାଏ

✔ପରଶୁରାମ ଓ ଜୟଦେବଙ୍କ ଜୟନ୍ତୀ

✔ବଦ୍ରୀନାଥ ଧାମ ଏହି ଦିନ ଖୋଲାଯାଇଥିବା ବିଧି ରହିଛି

✔ସତ୍ୟ ଯୁଗର ତ୍ରେତୟା ଯୁଗର ଆରମ୍ଭ ଏହି ଦିନ ଆରମ୍ଭ ହୋଇଥିଲା ।

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